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लत लगे जब उदासी की

 

लत लगे जब उदासी की,
तो खुश रहने का मन नही करता।

 

अश्कों से भीगे रुखसारों को,
बारिश में भीगने का मन नही करता।

 

अपनों के दिए जख्मों पर,गैरों ने लगाए मरहम,
किसी को पराया कहने का अब मन नही करता।

 

सामने बड़ाई,पीठ पीछे चुगली,
हर जुबान पर भरोसा दिखाने का अब मन नही करता।

 

कुछ गले लगाने वालो ने ,पीठ में घोंपे खंजर,
आस्तीन के सांप को दूध पिलाने का अब मन नही करता।

 

कुर्ते की सिलवटों से बेतरतीब बेहूदा कर्म,
कुत्ते की पूंछ को सीधा बनाने का,अब मन नही करता।

 

भलाई की बात बोलो तो मारने आते,
अंधे को आइना दिखने का अब मन नही करता।

 

सीधी शरीफ भाभी भी जब माँ को खून के आंसू रुलाये,
घर में नयी दुल्हन लाने का तब मन नही करता।

 

 

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