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मैं मनुज बनकर मुदित हूँ मित्र मेरे

 

 

"मैं मनुज बनकर मुदित हूँ मित्र मेरे,
मैं भला भगवान बनकर क्या करूँगा।
(१)
प्रिय मुझे वह व्यक्ति जो रोये दुखों में,
प्राप्त कर के सुख हँसे औ मुस्कुराये।
देवता रुचते न वह जो दु:ख सुख में,
घूमते हैं एक सा चेहरा बनाये।

 

वह अभागे देह धर कर भी मनुज की,
जिंदगी का कौन अनुभव कर सकेंगे;

 

मैं जिऊँगा मानवीय प्रवृत्तियों को,
त्याग या उनका दमन कर क्या करूँगा।
मैं मनुज बनकर मुदित हूँ मित्र मेरे,
मैं भला भगवान बनकर क्या करूँगा।
(२)
एक बचपन से कहावत सुन रहा हूँ,
आँख देखा सच, सुनें जो कान झूठा।
पर किया विश्वास आँखों देख जिनका,
झूठ बनकर के उन्हीं ने मुझे लूटा।

 

कान सुनने की झुठाई क्या कहूँ मैं,
आँख देखा जब हमारा झूठ निकला।

 

झूठ सच की इस पुरानी धारणा को,
मानकर,गुनकर,ग्रहण कर क्या करूँगा।
मैं मनुज बनकर मुदित हूँ मित्र मेरे,
मैं भला भगवान बनकर क्या करूँगा।
(३)
फूल को मैंने दुलारा है बहुत दिन,
खूब उसके रूप को आदर दिया है।
जान ही पाया न काँटों की चुभन से-
प्राप्त सुख को, ध्यान उन पर अब दिया है।

 

खूब भटका, खूब भरमा,किंतु पाया-
चैन काँटों की नशीली गोद में ही।

 

शूल ही अब रास मुझको आ रहे हैं,
फूल की माला पहनकर क्या करूँगा।
मैं मनुज बनकर मुदित हूँ मित्र मेरे,
मैं भला भगवान बनकर क्या करूँगा।"

 


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-गौरव शुक्ल
मन्योरा

 

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