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मुझको मेरा गॉव दिखा दो

 

 

कोयल का संगीत सुना दो
मुझको मेरा गाँव दिखा दो।।

 

कंक्रीटों के हवा महल में
फंसा हुआ मेरा जीवन है
झूठी आशा बड़ी पिपासा
रूप धरे नित नूतन है।
कैसी है ये मूक विवशता
मानव का संवाद मन्द है
रिश्ते सारे पड़े दुआरे
मेरे मन तो छिड़ा द्वन्द है
विष की इस गगरी को
जाकर के तालाब सिरा दो
मुझको मेरा गाँव दिखा दो।।

 

कच्ची सड़क दुआरे की
गुमसुम से चौराहों की
जहाँ बैठ अक्सर खेला
सुनकर बात बहारों की
चड्ढी पहने बागों-बागों
मिठुआ अम्बियां तोड़े थे
देख हमें माली काका
जहां डंडा लेकर दौड़े थे
उन्हीं आम के पेड़ो को
जाकर मेरा नाम बता दो
मुझको मेरा गाँव दिखा दो।।

 

सौंधी सौंधी बारिस की
खुशबू जब जब आई थी।
बाबा वाले उस कमरे में
अम्मा पकउड़ी लाई थी।
बैठ जहाँ बेपरवाही से
दोनों हांथो हम खाते थे
गोदी चढ़ बूढ़े बाबा की
हम तो झट सो जाते थे
ऐसे भोले बिना दांत के
बाबा की इक चुम्मी दिला दो
मुझको मेरा गाँव दिखा दो।।

 

झूले पड़ हुये डालों में
बलखाती सरसों खेतों में
लोट रहे हैं भोले बाबा
भाँग चढ़े शिवालों में।।
कजरी सोहर गीतों की
लगी हुई हैं आज कतारे
गरजे-तरजे बदरा में
नाच उठे हैं मोर कि सारे
ऐसी उन्मादी बरखा का
आज मुझे अमृत चखा दो
मुझको मेरा गाँव दिखा दो।।

 

 

 

©प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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