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तुम मुझसे रूठ गये लेकिन, क्या याद नहीं करते होगे!

 

 

(१)
जब खड़े रसोई में होकर के चाय बनाते होगे तुम,
पीछे मेरी आहट पाकर क्या चौंक न जाते होगे तुम?
वह दबे पाँव आकर तुमको, अपनी बाँहों में भर लेना;
तब अपनी गर्दन पीछे कर, मेरे कंधे पर धर देना।

 

जब पानी खौला करता था पर शकर नहीं पड़ पाती थी,
जब अदरक की नौबत कुछ देर धरी रह जाती थी।
वह बंधन करके याद कहो क्या चौंक नहीं पड़ते होगे!
तुम मुझसे रूठ गये लेकिन, क्या याद नहीं करते होगे!


(२)
मेरी खातिर कपड़े खरीद लाने की वह जो आदत थी,
फिर मुझसे सही गलत पहचनवाने की वह जो आदत थी।
जब मैं कहता था-ठग आईं, तुम कहती थीं-ठग आने दो;
जब तुम पर जँचे न,तब कहना,छोड़ो मुझको समझाने को।

 

अपनी ही रोज चलाते हो, कुछ मेरी भी सुन लिया करो,
मेरी पसंद इतनी जल्दी तो नापसंद मत किया करो।
क्या गला नहीं भरता होगा जब वह दुकान चढ़ते होगे!
तुम मुझसे रूठ गये लेकिन, क्या याद नहीं करते होगे!


(३)
मुझसे पल भर न बिछुड़ने की, वह व्याकुलता सो गई कहाँ?
मेरे सँग कहीं घूमने की वह आतुरता खो गई कहाँ?
कुछ तुम बदले, कुछ हम बदले, कुछ-कुछ हम दोनों बदल गये,
दुनिया की आपाधापी में, हम दोनों आगे निकल गये।

 

दाढ़ी हो गई सफेद और कानों पर बाल सफेद हुये,
इस संबंधों की चादर में माना अनेकशः छेद हुये;
विश्वास किंतु अब भी मेरा, तुम ध्यान नित्य धरते होगे!
तुम मुझसे रूठ गये लेकिन, क्या याद नहीं करते होगे!"


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गौरव शुक्ल मन्योरा

 

 

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