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आज हमारे और तुम्हारे बीच न कोई बंधन, साथी!

 

 

(१)
तुम पूनम की शुभ्र चाँदनी, मैं मावस का घोर अँधेरा;
तुम वीणा के मधुर राग-सी, अब तक सधा नहीं सुर मेरा।
अगर प्रेम का सपना मैंने, देख लिया तो देख लिया क्यों?
क्यों यथार्थ विस्मृत कर बैठा, सपनों को आकार दिया क्यों?

 

कब तक तुम्हें बाँध कर रखता, मेरा शापित जीवन, साथी!
"आज हमारे और तुम्हारे बीच न कोई बंधन साथी!
(२)
मेरे पास कलम कागज था,मणि-माणिक्य कहाँ से लाता?
मेरी माँ थी हंसवाहिनी, कैसे धन का भोग लगाता?
तुम उलूकवाहिनी उपासक, मेरे कैसे हो सकते थे?
दोनों में छत्तिस का नाता, है, यह बचपन से सुनते थे।

 

मुझे त्याग कर सिद्ध कर दिया,तुमने नियम पुरातन, साथी!
"आज हमारे और तुम्हारे बीच न कोई बंधन साथी!
(३)
अपने रिक्त करों से मैंने, तुम्हें नहीं क्या-कुछ दे डाला;
अपने दीन हृदय से मैंने, तुम्हें दिया देवत्व निराला।
अपनी पूजा की थाली के, सारे फूल चढ़ाये तुम पर;
जग का सारा प्यार बटोरा, लाया, किया तुम्हें न्यौछावर।

 

पर निर्दयी तुम्हारे दृग में, हुआ व्यर्थ हर पूजन, साथी!
"आज हमारे और तुम्हारे बीच न कोई बंधन साथी!
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गौरव शुक्ल मन्योरा

 

 

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