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प्रकृति आज नैसर्गिक ढँग से सजी सजाई है

 

शिक्षक दिवस के अवसर पर-
"प्रकृति आज नैसर्गिक ढँग से सजी सजाई है,
शायद अपनी पाँच सितम्बर फिर से आई है।
(१)
कितनी मनमोहक लगती है हरी-भरी धरती,
नीरस हृदयों को भी पुलकित आनंदित करती।
मोरों के उन्मुक्त नृत्य, विस्मृत करने वाले,
शीतल मलय-पवन के झोंके मन हरने वाले।

 

अहा! दृश्य कितना अनंत उल्लास सहेजे है,
घास-पात भी क्या स्वच्छंद विकास सहेजे है।
हरियाली, खुशहाली की परिभाषा लाई है।
निश्चित ही यह अपनी पाँच सितम्बर आई है।
(२)
पाँच सितम्बर,सर राधाकृष्णन का जन्म-दिवस,
पाँच सितम्बर है महान शिक्षक का जन्म-दिवस।
पाँच सितम्बर प्रतिभा के विस्तारण का दिन है,
पाँच सितम्बर,सबके गौरव -कारण का दिन है।

 

पाँच सितम्बर, आदर्शों के पाठ पढ़ाता है,
पाँच सितम्बर उत्साहों के घट भर लाता है।
पाँच सितम्बर सबके लिये प्रेरणादायी है।
वही विश्व-विश्रुत यह पाँच सितम्बर आई है।
(३)
पाँच सितम्बर अपना शुचि अतीत दुहराती है,
सुनो-सुनो यह हमको कुछ संदेश सुनाती है।
कहती है-"कर्तव्य शिक्षकों अपना मत भूलो,
करो राष्ट्र-निर्माण, गगन की ऊँचाई छू लो।

 

आज देश की व्यग्र दृष्टि है तुम पर टिकी हुई,
है विकास की गति तेरे कर्मों पर लिखी हुई।
विश्व जाग जाता जब तू लेता अँगड़ाई है।
देखो, समझो, उठो कि पाँच सितम्बर आई है।
(४)
कभी राम का, बन वशिष्ठ, व्यक्तित्व सँवारा है,
सांदीपनि बन, कभी कृष्ण का,तेज निखारा है।
बनकर के चाणक्य कहीं तरकीब बताई है,
गुरु गोविन्द सिंह बनकर तलवार चलाई है।

 

रामदास बनकर स्वदेश में ज्योति नई भरिये,
इतनी उज्ज्वल परम्परा को स्याह नहीं करिये।
तुमने सदा देश की अपने कीर्ति बढ़ाई है।
यही सँदेश सुनाती पाँच सितम्बर आई है।"

 

प्रकृति आज नैसर्गिक ढँग से सजी सजाई है,
शायद अपनी पाँच सितम्बर फिर से आई है।

 

 

-गौरव शुक्ल
मन्योरा

 

 

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