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संध्या गीत

 

 

अतुल्यनीय ये प्रभाकर चल दिया आराम को
साँझ की ये सिलवटें हो रही तैयार ज्यों
ओ प्रिये तुम हो कहाँ आज मिलन की रात है
देखो चाँद भी चांदनी को ,दे रहा सौगात है।
बात गहरी है मगर ध्यान लाकर तुम सुनो
प्रेम कोई खेल नही गुड्डा गुड़िया तुम बनो
हो तड़िगनी की मनोहर अविचल धार तुम
कर्ज सागर का उतारो भूल सारा भार तुम
तेरी लाली तेरा गजरा पूंछेगा कुछ अनमना
बोल क्या उत्तर होंगे सिर्फ बहानों के सिवा
औ सखी के सम्मुख आ न जाये लाज तुमको
आ भाव शून्य अर्थ ले ,दूँ एकत्व साज तुमको

 

 


--प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

 

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