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मैं उन गलियों को पीछे बहुत छोड़ आया

 

 

 

"मैं उन गलियों को पीछे बहुत छोड़ आया,
था जिन्हें तकल्लुफ मेरी आवाजाही से।
(१)
जिनको मेरी इज्जत से कुछ वास्ता नहीं,
उन तंग मकानों में मैं कदम नहीं रखता।
खुलकर कह देता हूँ जो कहना होता है,
कहने में सही गलत कुछ शरम नहीं रखता।

 

पैसों से कद की ऊँचाई नापी जाती,
ऐसे ऊँचे महलों से मुझे शिकायत है।
दो बोल प्यार के जहाँ सुनाई पड़ते हैं,
उन झोपड़ियों में जाना मेरी आदत है।

 

जो लगे गधों को घोड़ा साबित करने में,
नफरत है मुझको ऐसी झूठ गवाही से।
मैं उन गलियों को पीछे बहुत छोड़ आया,
था जिन्हें तकल्लुफ मेरी आवाजाही से।
(२)
मेरे मुश्किल हालातों में जो छोड़ गये,
ऐसे रसूखदारों की क्या परवाह करूँ।
किसलिए चोर को शाह बताता हुआ फिरूँ,
क्यों सीधे सादे लोगों को गुमराह करूँ।

 

उम्मीद करूँ क्यों कदम लड़खड़ाएँगे जब,
मेरे, तब वह मुझको सँभालने आएँगे।
जब घनी अँधेरी राहों से मैं गुजरूँगा,
तब उन राहों पर दीप दिखाने आएँगे।

 

दास्तान दर्द से भरी कहूँ ऐसों से क्या,
आनन्द जिन्हें मेरी हो रहा तबाही से।
मैं उन गलियों को पीछे बहुत छोड़ आया,
था जिन्हें तकल्लुफ मेरी आवाजाही से।"


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-गौरव शुक्ल
मन्योरा

 

 

 

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