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विविध जय

 

 

रचनाकार-विविध जय

 

 

आ सिंधु से आसाम तक
योगिशिला से मानसर
स्वच्छ हो समर्थ हो
मातृ-भू का हर नगर

 

सुराज की ये कल्पना
स्वछता की गर्जना
अनेक हो के एक हो
हर नगर की हर डगर

 

ज्ञान के मंदिरों में भी
द्रोही कूड़ा है जमा
भरत सूत अब एक हो
क्रान्ति की हो फिर समर

 

स्वछता से मात की
करेंगे नित शृंगार हम
नित्य कर्म भी राष्ट्र धर्म
सिद्ध कर दिखलाए हम

 

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