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मोहिन्दर कुमार

 

हाईकू

बंद पलकें
व जागते सपने
मेरा संसार

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छुआ उसने
न जाने क्या सोच
पुलकित मैं

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घडी के कांटे
टिक टिक करते
बीता जीवन

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निगला कौन
अंतिम पहर में
सोते चांद को

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धूप जलाती
या शीतल करती
वहा पसीना

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नम नयन
होठों पर कंपन
कथित मौन

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आ भी जा अब
बिसरा कर सब
वक्त नहीं है

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