tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






 

 

वंशस्थ गौतम

 

मौन

 

 

ईश्वर मौन
उसकी यह भाषा
समझे कौन?

 

समझो मौन
अगर चाहो पाना
दैवीय प्रेम ।

 

मौन मंथन
जब भी हो दिल में
मिलते रत्न ।

 

डूबो खुद में,
समुद्र से गहरा
स्वयं का तल ।

 

मौन हो तुम
है अद्भुत संवाद
मौन हूँ मैं भी ।

 

खुलेंगे चक्षु,
अपनी अंतः वाणी
जो हम सुनें ।

 

तू है मुझ में
क्यों तुझे तब ढूँढूँ
इस जग में ।

 

क्या हैं सोचते,
कभी तो बैठ हम
सोचें यह भी ।

 

खुदा ही प्रेम
है कितनों ने जानी
यह सच्चाई ।

 

होता समर्थ
जिसको मिल पाती
प्रेम की छांव ।

 

---------------------------------------------

 

 

जीवन सूखा
दिन दिन बीतता
अंधेरी शाम |१|


घोर अँधेरा
सूरज घबराया
नहीं आराम |२|


दिल बेचैन
कटती नहीं रैन
दूर सवेरा |३|


बेबस हम
तम न होता कम
सूरज गुम |४|


मंद रौशनी
बढ़ता अंधियारा
निर्जन पथ |५|

 

घुटता रहा
जीने की आस लिए
मिटता रहा |६|


ओर ना छोर
न जाने कब टूटे
जीवन डोर |७|


किसने जाना
संयत जीवन का
भेद पुराना |८|


आडम्बर में
जीवन पूरा बीता
कभी न चेता |९|


मेरे मालिक
बस तेरा आसरा
शेष न कुछ |१०|

 

 

 

 




HTML Comment Box is loading comments...