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आँकड़े सच बोलते हैं

 

 

 

पिता का देहावासन के बाद सोहन पर पहाड़ जैसा बोझ आ पड़ा। बिगड़ती हालात को
संभालते हुए पड़ोस के जिला मेँ ही बड़ी बहन रीमा की शादी की।
लड़का भी पढ़ा लिखा। सूरत मेँ किसी अभिनेता के तरह शारीरिक गठन से लबालव।
शादी के कुछ दिन बाद से ही विकास अपने ससुराल को ही घर बना लिया। सोहन को
भी एक सहारा मिला, घर के काम-काज मेँ हाथ बटाने वाला। अपनी अनुपस्थिति
मेँ किसी हलचल का परवाह नहीँ।
आस पास मेँ कानाफुसी तो होता ही था।
जबसे शादी हुई, रीमा का पति घर मेँ ही पड़ा रहता था।
"रीमा अपने ससुराल मेँ और विकास अपने ससुराल मेँ।"
सोहन की पढ़ाई लाचारी ने लील गयी। विधवा मां की खयाल के साथ-साथ, छोटी बहन
के लिए भी परेशानी की सबब।
कारी पढ़ने मेँ तेज थी। विद्यालय मेँ सीमा नाम से दाखिला ले रखी थी। चार
भाई-बहन मेँ सीमा श्यामली। रंगहीन त्वाचा ने दो नाम दे रखा, कारी और
सीमा।
"सीमा चाहती थी कि पिता का सपना साकार करुँ।"
पढ़ लिख कर किसी मुकाम पर पहूँच जाऊँ तो समाज के साथ-साथ बेटियोँ के प्रति
घिनौनी सोच मेँ भी तब्दिली आयेगी।
कैसा ही आभाव की बादल मंडराए कॉलेज जाना छोड़ती नहीँ थी।
प्रतिदिन कॉलेज जाना विकास को नागवार गुजरा। मालिकाना हक का बेपरवाह
उपयोग करना हक मान बैठा ।
विकास वोला, मां जी! "सीमा को निःसंकोच प्रतिदिन कॉलेज भेज रही हैँ, कहाँ
पहूँच जायेगी?"
आज कल तो लड़की दसवीँ पास करे या न करे, बहुत है।सीमा तो बारहवीँ कर चुकी
है। अब बी.ए. कर रही है। कल उसकी शादी के लिए दर-दर भटकना होगा। उच्च
शिक्षा के लिए दहेज-दानव का भी चंगुल मेँ जाना पड़ेगा।
मां भी ठंडे मन से विचार की। सहमती में सिर हिलाई, सही बात है। अपना ही
तो अच्छे-बुरे का खयाल करता है।
"सुनो सीमा, जीजाजी भी घर का सदस्य हैँ। उनकी भी बातोँ पर ध्यान देना है,
हॉलात और पारिवारिक पेँच के बजह से सही कह रहे हैँ। वे रहते तो किसी तरह
की परेशानी नहीँ होती। अब तो सुक्ष्म से सुक्ष्मता भेद को भी विचार करते
हुए कदम-दर-कदम बढ़ाना है।" मां बोली।
सीमा महसूस की, किसी कसाई ने प्राण-पखेरु के लिए तैनात है।
सकुचाते हुए, "मैँ पढ़ूँगी।" लाख कोई मना करे, लांछना लगावे। मैँ अपनी
पढ़ाई जारी रखूंगी । सीमा बोली।
"मन ही मन सोची, "खुद अपना दायित्व हूँ, तुम नहीँ।
धीरे-धीरे विकास का दबदवा बढ़ता गया। प्रतिदिन के बजाए सप्ताह मेँ दो-तीन
दिन ही कॉलेज जाने लगी।
बी.ए. भी कर ली, अब एम.ए. की सीढ़ी पर कदम रखना था।हिन्दी की छात्रा होते हुए भारतीय संस्कृति मेँ शीलवान होना न्याय-संगत
है। शालीनता मेँ अव्वलता हासिल की हुई थी ।
विकास की कैँची धारदार के बजाए धीमा पड़ता जा रहा था, तब भी धार बनाने के
लिए शान चढ़ाना मजबूरी या जरुरी लगा।
"मां जी, घर परिवार व समाज के लिए तौहीन की बात है। आपके कहने के बावजूद
भी सीमा संभल नहीँ रही है। उसे क्या मालूम? समाज किस निगाह से देख रही
है? मेरा भी घर परिवार है, मैँ वहाँ भी रह सकता हूँ। यहाँ रहने का कुछ
कारण है, किसी तरह की बदनामी न आ पहूँचे। सोहन अभी छोटा है, आप भी घर मेँ
रहती हैँ। चिँता की कोई बात है तो वह सीमा ही है। पिताजी अगर होते तो,
मुझे रहने की कोई आवश्यकता नहीँ।"
सोहन का भी खयाल रखना ही होगा। ऐसे भी वह लड़का है, सीमा पर तो ध्यान देना
कर्तव्य बनता है। विकास अपने मेँ समेटने का सफल प्रयास किया।
मां, ऊहापोह की स्थिति मेँ जा पहूँची। आखिर क्या किया जाए?
मां जी! मैँ सीमा को परखने का भी काम किया । वह किसी कविता, कहानी लिखने
वालोँ के साथ बात कर-करके खुद को महान बनना चाहती है। जबकि, पुरुष को
समझने मेँ अभी भी अनभिज्ञ है। कहानी, कविता किसी पत्र-पत्रिका मेँ छप ही
जाए, तो क्या हो जायेगा? लाखोँ ऊलुल-जुलूल छपती रहती है। लिखने मात्र से
चरित्रवान नहीँ हो जाता है।
"उसकी नादानी, एक दिन इज्जत-प्रतिष्ठा को धूल के साथ उड़ने मेँ साथ देगी।
एक मर्द को मर्द से ज्यादा कोई नहीँ समझ सकता।"
अपना अध्याय समाप्त कर प्रतिक्रिया के लिए तैयार था। नजरेँ नीचे और
कर्ण-मस्तिष्क मां की ओर।
"मां सुनकर सन्न रह गयी।"
सामाजिक भेड़ियोँ से अवगत थी। दिन व दिन ढ़ोँगी पुरुष के चक्कर मेँ नजायज
काम बढ़ ही रहा है। वह भी सोची आज के दौर मेँ ऐसा होना, अनहोनी नहीँ।
"कुछ प्रतिक्रिया न मिलने के कारण विकास वैसे निकल चला, जैसे कि कोई अविश्वासी हो।"
सीमा को एकांत मेँ मां समझाने की प्रयत्न कर रही है , सीमा, अब एम.ए.
करोगी। फिर मैँ एम.ए. का लड़का ढ़ूंढ़ूंगी? तुम्हारी शिकायत भी मिल रही है।
कॉलेच आने-जाने के क्रम मेँ किसी आलोक नाम का लड़का से बात करती हो।
बेटी, मेरी और खानदान की प्रतिष्ठा तुम्हारे हाथोँ है। वरना, तुम्हारी तो
बेईज्जती होगी ही, परिवार वालोँ भी सकते मेँ आ जाएंगे।
सीमा आदत से लाचार थी । छल मेँ नहीँ, भावना मेँ जिती थी। नारी तन की पूरक
नहीँ बल्कि पूर्ण व्यक्तित्व की ढ़ांचा थी। खुलकर जबाव देने की बचाए
गुमसुम पड़ी रही। सिसकना, फफकना ही जबाव था।क्षण भर मेँ विकास भी आ धमका। मां जी, देख लिए न? इसे मैँ ही संभाल
पाऊँगा। "चुप रहना अपराध कुवूल करना होता है।" सीमा को घूरते हुए बोला।
"सीमा अब तुम कॉलेज नहीँ जाओगी।"
मैँ आलोक को भी जान रहा हूँ और तुम्हारी काली करतूत को भी। आलोक क्या है
, मैँ अच्छी तरह से अवगत हूँ? कहानी-कविता किसी पुरुष की पौरुष-क्षमता
क्षीण नहीँ कर देता। घिसा-पिटा जीवन जीने को जरुर मजबूर कर देती है। तुम
क्या सोची हो, उसके साथ जिन्दगी सुखमय कटेगी? पलभर चुप रहने के बाद विकास
बंद पिटारा खोल दिया।
सीमा अंदर ही अंदर कराह उठी। बिना सोचे समझे बोली, "आलोक आपको आवारा लग रहा है ?"
"मां जी, सुन लिए न! सच्चाई कैसे सामने आती है?" विकास कुटिल मुस्कान के
साथ मां को ध्यान कहा।
"मां भी सिर पर हाथ लिए सीमा को विश्वासघातन बताने से नहीँ रोक पाई।"
कॉलेज आना जाना बंद। हाथ-पैर पारिवारिक आबरु को बचाने के लिए बंध गया।
दिन भर घर मेँ बैठी-बैठी, विकास का समाज से बंधने वाला सुंदर वचन, कभी
मां की पारिवारिक सौन्दर्य तो कभी चरित्रवान बनने की सलाह एम.ए. का विषय
मेँ शामिल हो गया। कॉलेज और सीमा के बीच मजबूत दीवार बन बैठा।
"सीमा फिर कॉलेज जाना शुरु कर दी, न मां ही रोक पाती है और न ही विकास का
पारिवारिक बंधन।
अचानक सुबह-सुबह सीमा सिसकती हुई कमरे से बाहर आ मां को ढ़ूंढ़ने लगी। आँखे
लाल-लाल। मां बाथरुम से निकली ही थी, सीमा लिपट कर रोने लगी । सिसकती जा
रही थी, मां कुछ समझ नहीँ पाई।
सीमा को लिए मां कमरे प्रवेश की, बदहवास हो गिर पड़ी।
लांछना का अंबार शुरु। रास्ते के रोड़े को हटाने की बात कानोँ तक टकरा रही
थी। विकास को घर का होनहार बता रीमा की भी दुहाई सराहनीय बन बैठा। विकास
का लहूलुहान शरीर भीड़ को अपने ओर खीँचे जा रहा है।
"विकास को चिकित्सक के पास ले जाया जाए।" सीमा फफकती हुई बोली।
धीरे-धीरे विकास होश मेँ आने लगा। ईश्वर की दया से जख्म पर लाली छाया।
नाते-रिश्तेदार एक ही सबाल दागे जा रहे थे, उस रात की परिस्थिति से अवगत होना?
"होनी को कोई टालने वाला नहीँ।" जबाव दे विकास खुद को झेँप लेता ।
"विकास को मैँने चाकू मारा, चाहती तो इसकी मृत्यू भी तय थी।"
सीमा बोल पड़ी।
कुछ देर पहले आँखे तरेड़ कर देख रहा, आवाज सुन बेहोशी का अंदाज अपना लिया।
"मां! तुम क्योँ नहीँ सोची कि जब दी की शादी हो गयी तो यह आवारा यहाँ
मसीहा क्यो बन रहा है?" रीमा दी, वहाँ खाने के बिना तो कभी कपड़े के बिना
तड़प रही है।घरवालोँ का उलाहना मेरे परिवालोँ को घेरे मेँ लिए जा रहा है।
कोई कहता है सास विधवा है, वह अपनी क्षुधा-पूर्ति के लिए दामाद को रख
लिया तो कोई कह रहा है-साली जवान है।
दी की ससुराल वालोँ का सोच बिल्कुल सही है। बदचलन, आदत से लाचार है। पहले
तो तुम्हेँ कान भरा, आलोक जैसे इंसान को भी बदनाम करने से नहीँ चुका।
मेरी पढ़ाई को भी बीच रास्ते मेँ तोड़ी। फिर यही रिश्तोँ का दंभ भरने वाला
सुलह का सौदा किया। तब, मैँ कॉलेज जाना शुरु की। जो मेरे साथ सुलहनामा
हुआ, वह इसके हाथ से फिसलता जा रहा था। अपने विवेक से अनेक बार टालने की
प्रयास करती रही, लेकिन इस नापाक का मर्दग्रंथी बर्दाश्त नहीँ किया। आज
अगर जीवित है तो इस पापी का श्रेय मानवता से ओत-प्रोत आलोक ही।
इससे पहले भी जब हैवानियत पर उतर आया था तो मैँ बेहोश हो गई थी। होश आने
पर पता चला कि यह अपने घर चला गया। जब-जब घर गया, एक ही कारण था- शारीरिक
भूख! भूख न मिटने के कारण दी की तलवोँ मेँ शरण पाना?
मैँ अपने को आजाद समझने लगी। पर, इस तरह औरत बदलने वाला बदमिजाज यहाँ
रहना शुरु कर दिया और किसी प्रकार की मेरी बदसलूकी इस शैतान पर छाया तक
नहीँ डाल पाया तो अपनी जीत और मेरा समर्पण समझ बगुले की भांति ताक लगाये
रखा।
"मैँ भी नारीत्व की रक्षार्थ हेतु संभल चुकी थी, चाकू लिए सोना नारी तन
को आजाद मान बैठी। संयोग कहा जाए कृष्ण के तरह सुदर्शन चक्र आलोक के हाथ
था। वरना, मेरे प्रति लांछना व बदचलन की ठप्पा लग जाती।"
कामुकशक्ति का सामना ये ही चाकू और कोमल हाथ की थी, तब जाकर मैँ बच पाई।
सीमा छुपाये चाकू बाहर निकाल रखी।
मां! तुम ही पूछो, कितनी औरतेँ चाहिये? आंकड़े भी सच बोलते हैँ-नारी की
अस्मत प्रायः अपनोँ के द्वारा लूटी जा रही है। मांसल भूखा ही आंकड़े को
बढ़ाने मेँ कामयाव हो रहा है।
इसकी सजा नहीँ मिल पाती और अपने विवेक से काम नहीँ लेती तो दो-जीवन
घुट-घुट कर व्यतीत होता।
"एक रीमा दी और दूसरी मैँ।"
याद करो मां, जब तुम अपनी बिमारी मेँ महीनोँ बाहर रहती थी। उस समय यही
रिश्तोँ के सौदागर के साथ रहना होता था।
सीमा बिना छुए विकास के कानोँ तक अपनी बात पहूँचाने मेँ काली बनी हुई थी।
"सुन नापाक! मैँ बदचलन और मक्कार हूँ , कारण तुम जैसे भेड़िये की बू से
सिकुड़ी नहीँ। जबाव दे नहीँ पाई, पर सड़ांध की बू पहले आ चुकी थी।"
वह भी ठीक ही हुआ। वरना यह नकाव नहीँ उतार पाती।मां, अब तुम ही बता और मुझे सजा दो।
सीमा फफक पड़ी। मां भी खुद मेँ सन्न।
सगा-संबंध विकास के प्रति खिन्नता भरी निगाहेँ से घूरे जा रहे हैँ -
विकास बेहोशी का ढ़ोँग लिए ढ़के चादर तले गर्म लौ मेँ तवे जा रहा था। अचानक
बदन से चादर खीँच ली सीमा, विकास बेहोशी का नाटक किए हुए ।

 

 

 

संजय कुमार अविनाश

 

 

 

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