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डॉ. श्रुति मिश्रा
कहानी


भँवर

 

प्राय: लोगो के जीवन की कहानिया हमारे सामने फ़िल्मी कहानी के रूप में प्रस्तुत कर दी जाती है और इसे हम मनोरंजन का साधन मान लेते है ! मै भी एक सच्ची घटना को कहानी के रूप में प्रस्तुत कर रही हू जिसके पात्र हमारे आस –पास ही मिल जायेगे !
हा, गुलाबो और गहना को मैंने देखा नही था और न ही मै खास मकसद से कभी उनसे मिली थी ! पहाडों पर रहने वाले लोग पत्थर तोड़ कर अपना पेट पालते है ! पुरुष और औरते दूर दराज के जगलों से भगाये हुए दहशत के मारे लोग है ,जो अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे है ! यह खानाबदोश अपने मालिकों को किसी भी तरह की चुनौती देने की मुद्रा में नही आ पाते ,क्योंकि अपनी ताकत और हालात से निरे कंगाल है ! गुलाबो और गहना इसी समुदाय की थी , जिनकी सहायता ईश्वर भी नही कर पा रहे थे !
जब कोई कल्याणकारी संस्था इनको आदिवासी का बोध कराती हुई लोकतांत्रिक हकों से परिचित कराती है , तो ये सुनते है ,मगर इन बातो को कारगर दलीले नही मानते है ! यह पहाडों और पत्थरों को ही अपना माँ – बाप मानते है ! साधारण घर भी उनकी औकात के बाहर है ! पहाड के नीचे ,ढाई फीट ऊची ,कच्ची दीवारों वाली टपरिया ,जिनमे लेट कर ही घुसा और निकला जा सकता है इसी तरह के राजमहल में गुलाबो रहती थी ! गुलाबो अनायास ही क्रेश मालिक से आशनाई कर बैठी! रामदीन ने आशिक के रूप में गुलाबो से उसके पन्द्रह वर्षीय सावले-सलोने शरीर का तोफा माँगा !वह मना भी कैसे करती ,मालिक की इच्छा पर समर्पित हो गयी !किशोरी गुलाबो के नव विकसित शरीर पर मर-मिटने वाले पुरुष को आखिर किसका लिहाज ? अपनी पत्नी का भी नही ,क्योंकि जिन दिनों गाव में परिवार-नियोजन का कैम्प लगा हुआ था ,रामदीन अपनी पत्नी के साथ गुलाबो को भी तीमारदारी के लिए ले गया ! उस कच्ची उम्र की बच्ची को जब वास्तविकता का बोध हुआ तो वह वहाँ से भाग गयी !तब से आदिवासी औरते मानने लगी कि नजदीकी बनाने वाले पुरुष प्रेम नही करते ,इस्तमाल करते है !कहने को वे औरत के रूप में अछूत है !
इसी रीति के अनुसार गहना का शरीर भी जगत राम के तपेदिक में शामिल होकर जर्जर और खोखला होता चला गया ! वे दिन मुझे आज भी याद है जब गहना लशलश करती आकर्षक देह कि मालकिन के रूप में भाभी के साथ मठठा मैंवाने आती थी ! गोबर डालती ,झाड –बुहार करती ! ऐसे ही तो दिन थे ,जब हँसी के मोती बिखेरती मुझसे मिलने आयी गहना बुन्देलखंडी में चहक कर बोली ,”काय जिया ,जीजा सोई आए तुमार संगे? “ गहना दिल से हँसती थी , जगतराम इसी अदा पर मर मिटे होगे ? भाभी कहती है –“हमारे पति हमारे साथ भी धोखा करते है और इनके संग भी !”उनके कारण अपमान दोनों औरतों का होता है,हम हो ,या गहना !”जगतराम तपेदिक के मरीज ,गहना को जब टेरे तब वह हाज़िर हो जाए !कटाई के समय मजदूर न मिले तो दो –चार मजदूरो को लेकर खेतों में हाज़िर हो जाती ! जगतराम के घरवाले मार –पीट पर उतर आते मगर गहना ठहरी लैला कि जुड़वाँ ,प्रेम करना कैसे छोड़ दे ? तपेदिक के मरीज ,जगतराम के पास उनकी पत्नी फटकती तक नही ,गहना विलग नही होती , प्यार के पीछे भागने वाली औरत !
भाभी बताती है कि गहना की बेटी सायानी हो गयी थी नाम –अहिल्या ! गहना को बुखार आ गया था ,अहिल्या जगतराम के यहाँ काम करने के लिए आ गयी ! चौखट पर खड़ी लड़की ने पुकारा ,”मातौन ,हम बाई ने काम के लाने भेजे है!बता दो ,पहले गोबर उठाए या मठठा मैंवाये!”खटिया पर बैठे जगतराम चौके – कोंयल कहा से कूकी? देखा कि सावली किशोर लड़की का चहेरा दिपदिपा रहा है ! हाथों में लाल रंग कि चुडिया ,कानो में चादी कि बालिया , बालों में रिबन ! क्या यह लड़की सौगात के रूप में सजा कर भेजी है गहना ने ! तुरंत ही विचार ने पलटा खाया !यह लड़की जाती बिरादरी की भी नही ,छोटी जाति की है !इसके बाप का भी अता-पता नही !यह सबके लिए बस एक कच्ची उम्र की औरत है !ऐसा विचार आते ही जगतराम ने अहिल्या पर धावा बोल दिया !जगतराम और गहना की बेटी की कहानी अपने विकराल रूप में घटित हुयी ! इस घटना से पहाड तक थर्रा गया ! आदिवासियों के जितने देवी –देवता होगे वे एक साथ गहना के शरीर में प्रवेश कर गए !गहना आज प्रेमिका के रूप में साक्षात् चडी और स्त्री के रूप में रनचंडी बन कर सबके सामने थी ! उसने अपने बाल नोच डाले , और माथा फोड लिया !उसने अपने दुर्भाग्य को हथियार बना लिया और जगतराम पर वार किया !अरे मालिक !, मै अपनी बेटी को बचाने के लिए खुद लुटती रही ! तेरी तपदिक को खुद ओढ़-पहन लिया ताकि अहिल्या टी.वी के कीडो से दूर रहे ! गहना ने जगतराम को दौडा लिया , हाथ आते ही पिटाई की ! कहती रही ,’मालिक तुझे तपदिक से बचाया था , अब तेरा खून करना होगा अपने ही हाथों से !” यह वही गहना थी जो प्यार करती तो चादनी उतर आती थी पहाडों पर ,दुआ देती तो अमृतकलश उतार लेती थी जगतराम के लिए ! बीच –बचाव करने वाले थक गए ! गहना पर जो देवी सवार थी ,शायद वह मुडमाल पहने थी और जगतराम का सर लेना उसका मकसद था! तब हमको महसूस हुआ कि इस प्रकार लड़ती है खाना –बदोश औरते ! ऐसी होती है एक बेटी कि माँ !ऐसे साहस पाते है पत्थर तोडने वाले लोग !कुछ भी सोचे ,मगर यह तो मनाना ही पड़ेगा कि प्रकृति न्याय की अभ्यस्त होती है ,इससे बचा नही जा सकता !

 

 

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