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धर्मरक्षक

 

 

‘‘साली..... छीनाल....’’ एक लाथ मारी उसने अपनी बीबी को.. वह पहले से ही फर्श पर बैठी हुई सिसकियाँ भर रही थी उस पर पती ने उसके कंधे पर जोर की लाथ मार दी. फर्श पर एक तरह से लुढक सी गई थी... और.. पती उसके तो मुंह से शब्द-अपशब्दों के जलते अंगारे निकल रहे थे..... ‘‘फिर एक लडकी अपने पेट में लिये घुम रही है... तेरा बाप देंगा क्या इसे पालने के पैसे....? एक तो तुझे पालू... उपर से पहले ही एक लडकी का बोझ तुने दे दिया और अब....... दूसरी .... कमीनी.... तेरे को बेटा जनना नहीं सिखाया क्या तेरे बाप ने..?’’ जब से शादी करके आई थी तभी से पती और सास के अत्याचार सह रही थी. जब सरीता को देखने आये थे. तब देवेन्द्र का परिवार एक कुलीन और इज्जतदार परिवार था. संस्कार और परंपराओं का आदर और धार्मिक रितीरिवाजों को मानने वाला परिवार था. मुछो पर ताव देकर देवेन्द्र के पिता ने कहा था, ‘‘भाई साब..! यह हमारे घर में बहु नहीं बेटी बनकर आयेगी और राज करेंगी. दहेज में कुछ नहीं चाहिये, जो भी कुछ देना है अपनी बेटी को ही दीजिये ताकी उसे कोई तकलीफ असुविधा ना हो’’ उसे भी वह पती के रुप में अच्छा लगा था. गठीले बदन का संस्कारी युवक. शादी तय हुई, धुम-धाम से बारात आई और सरीता को लेकर बिदा हो गई. सरीता के पिता ने दहेज में आधा किलो सोना, एक मोटरसायकल दी थी, भेटस्वरुप भी काफी कुछ मिला था उसे.
सरीता सहमीसी दुल्हन के रुप में अपने ससुराल के दरवाजे पर खडी थी. गृहप्रवेश हुआ. घर के आहते में कदम रखते ही उसने देखा, घर क्या एक बहुत बडा बाडा ही था. चार दिवारी के अंदर ही गौशाला थी. उसके बाद घर की मुख्य दो मंजीला इमारत. पुर्णतः सुख संपन्न परिवार था. घर में कुल सदस्य सास-ससुर, ननद, पती और अब उसे मिलाकर पाच लोग हो गये थे. घर के मुखिया उसके ससुर थे. आर्थिक सुबत्ता गौशाला से ही प्राप्त हुई थी. तकरीबन 10-12 गाय, दो बैल और 8 भैसे थी. नुक्कर पर डेअरी थी जहां से दुध और दुधजन्य सभी पदार्थ बेचे जाते थे. एक लाख से उपर की आमदनी होती थी. पती की गांव और समाज में काफी इज्जत थी. गोवंश रक्षा समिती के अध्यक्ष थे. इसलिए दिन भर कई लोगों का आना-जाना लगा रहता था. मिटींग और बैठक आये दिन होती ही रहती थी. डेअरी पर सरीता के ससुर बैठते थे और देवेन्द्र दिन भर घर में ही रहते थे ताकी गोरक्षा समिती के सदस्यों और गौ संबंधी समस्याओं के लिये आने वालों से बातचित करना उनकी समस्या सुलझाना, कोतवाली, सरकारी कार्यालयों में कार्यकताओं का हुजूम लेकर जाना आदी सभी कार्य देवेन्द्र की अगुवाई में ही होते थे. यही दिनचर्या थी उनकी इसलिए उनकी धौंस और इज्जत गांव में, समाज में, सरकारी कार्यालयों और पुलिस महकमें में अच्छी खासी थी.
सरीता खुश थी कि उसे ऐसा ससुराल मिला. दिन खुशी खुशी बितने लगे, पती का प्यार पाकर मन पुलकित हो उठा. सास ने समझाया था, ‘‘बहु ! इस घर में हम सब सुबह-सुबह उठ जाते है, नहा-धोकर गौशाला में जाकर चौपायों की भी पुजा करते है. उन्हें चारे के रुप में भोग चढाते है, उसके बाद ही, घर के सभी लोग अपने मुंह में निवाला डालते है. आज से तुम्हे भी यही सब करना होगा.’’ सरीता ने सिर हिलाते हुए हामी भरी. उसने देखा गौशाला में काम करने के लिये दो नौकर है जो जानवारों को नहलाने और गौशाला की साफ सफाई का काम कर रहे है. धिरे धिरे सरीता ने सब समझ और सिख लिया था वह इस घर का हिस्सा बन गई और इस घर की सभी पम्पराओं और रोजमर्रा की जिन्दगी को अपना लिया था.
पर ‘चार दिन की चांदनी और फिर काली अंधेरी रात’ वाली कहावत चरितार्थ होने लगी. उसके सामने घर के सदस्यों का दूसरा चेहरा उभर कर सामने आने लगा. उसकी खुशीयां मौसमी पंछियों की तरह फुर्रर हो गई और उसके दिलो-दिमाग पर तानों की बरसात हुई. मन अंदर तक भिगने लगा और आँखों के बांध तोडकर सैलाब बहने लगा था. सांस से जब भी सामना होता वह कहती, ‘‘अरी ओ कलमुँही...! तेरा बाप भिखारी है क्या...? ये क्या सोने के नाम पर पितल थमा दिया हमे....! मै तो सोचती थी, तेरा बाप अपनी बेटी को उपर से निचे तक सोने से मढवाकर भेजेंगा पर उसने तो कुछ भी नहीं दिया.’’ देवेंद्र रात में उसे समझाता, ‘‘जाने दे,,, मां है वो मेरी, बुढी हो चली है.... उसकी चाहत थी कि तुम पुरी सोने से लदकर आओगी, यह कामना तेरे पिता पुरी कर देते तो वह ऐसा कभी नहीं करती. मै मां को समझाऊंगा,’’ देवेन्द्र उसे समझा बुझाकर अपने पती होने का फर्ज पूरा करता रहा. उसे लगता था चलो घर का कोई भी उसके साथ ना हो पर उसका पती को उसका है पर यह भ्रम तब टूटा जब वह पेट से थी.
सरीता को पाँचवा महिना चल रहा था. देवेन्द्र ने अपनी पहचान और अपने पैसो के जोर पर गर्भलिंग परिक्षण करवा लिया. पता चला बेटी है. इत्ता....सा मुंह हो गया था देवेन्द्र का. घर आते ही बरस पडा... ‘‘साली.....’’ पहली बार अपने लिये यह शब्द सुना था उसने अपने पती के मुंह से. कुलीनता, संस्कार, उच्च जाती के होने का गर्व सभी न जाने कहा कितनी गहराई में समा गये थे. वह टकटकी बांधे देवेन्द्र को देखने लगी. आँखों में कई सवाल.... ‘‘ऐसा क्या गुनाह हुआ मुझसे...? क्यों ये ऐसा बर्ताव कर रहे है,’’ उसकी तंद्रा टूटी और लगा मानो देवेन्द्र उसके कान में शब्द नहीं तपती सलाखें घुसां रहा हो, ‘‘मुझे बेटा चाहिये था... बेटी नहीं..! तुझे इतना प्यार दिया. हमेशा घरवालों से बचाया उसका ये सिला दिया... कमिनी.. जा मर...’’ थोडी देर खामोश रहने के बाद फिर बोला, ‘‘देख इस घर में औरतों को सर का ताज बनाकर सर पर नहीं पहना जाता बल्कि उसे जूती बनाकर अपने पैरो में पहनने का रिवाज है, ताकी खुद तो मैली हो पर अपने पती के पैरो को भी गंदा न होने दे... आगे से तेरी यही औकात है, ध्यान रहे!’’ और जोर का धक्का देकर, निकल गया कमरे से. गिर गई सरीता फर्श पर, कमरे में सिर्फ सिसकीयाँ बची थी, उसका साथ देने के लिये कोई नहीं था उस समय जो उसका सहारा बनता.
दिन बिते... बेटी ने जन्म लिया, पर घर में मातम का माहौल बना रहा. कोई खुश न था. दो ही दिन बाद एक गाय ने भी एक मादा बछडे को जना. उस दिन तो पुरे घर में खुशी का माहौल था, ‘‘गौ माता ने एक और गौ माता को जन्म दिया है. जो दूध नहीं अमृत देती है. पुरे घर को पवित्र रखती है.’’ यह कह-कह कर पुरे मुहल्ले में मिठाई भी बांटी गई.
सरिता को बेटी होने का यह सिला मिला की अब आते जाते देवेन्द्र भी उसे ताने देने लगा था. घर के काम करने वाली एक मशिन बनकर रह गई थी सरिता. घर के कामों के साथ साथ उसे गौशाला के कामों में भी लगा दिया था. गायों को नहलाना, गोबर उठाना, गंदगी साफ करना, दूध देने वाली गायों के स्तनों को मशिन लगाकर दूध निकालना आदी सारे काम भी अब उसके जिम्मे आ गये थे. ‘यही सब लिखा था मेरे नसीब में’ अपने मन को यही तसल्ली देकर और नियती मानकर जीना शुरु कर दिया था. दिन गुजरते गये. दिन भर काम करना और रात देवेन्द्र के नाम करना. अब प्यार लेने-देने की जगह वह सिर्फ अपनी भुख मिटाने लगा था. जब मर्जी होती टुट पड़ता और सो जाता. जब अपना यह दुखडा अपनी ननद के पास सुनाया तो ननद ने तसल्ली में इतना ही कहा था, ‘खुश किस्मत हो भाभी मेरा भईयां बाकी मर्दो की तरह रोज शराब पीकर नहीं आता और दुसरी औरतों के पास नहीं जाता, आप उसे खुश रखोगी तो ही इस घर में टिक पाओगी’
देवेन्द्र की समाज में और भी वाह वाही होने लगी थी. इन एक-दो सालों में सरकार ने जो गौ हत्या बंदी का कानून पास किया था तब से देवेंद्र ने कई गायों को कत्तल खाने जाने से बचाया था. जिनमें से कुछएक अच्छी नस्ल की और सुदृढ गाये अपनी गौशाला में लाकर रख दी थी और अब उनसे मिलने वाले दुध पर कमाई भी शुरु हो गई थी. गौवंश रक्षा समिती की आये दिन घर में बैठके होने लगी, कुछ बैठके खुली होती थी जिनमें सभी कार्यकर्ता आमंत्रित होते थे और कुछ बैठके खास जिनमें देवेंद्र के कुछ खास नुमाइंदे और कोतवाली के पी.आई खास कर मौजूद होते थे. सरीता का दर्जा उस घर में नौकरानी जैसा हो गया था. इसलिए इन विशिष्ट बैठकों मेे उपस्थित लोगों की चाय-नाश्ते की व्यवस्था सरीता को ही करनी पडती थी. अन्य किसी नौकर को इस बैठक के दौरान बीच में आने की सख्त मनाई थी. अतः सरीता उनके लिये चाय लेकर जैसे ही कमरे में पहुंची उसके कानों मे देवेंन्द्र के शब्द पडे, ‘‘देखो दरोगा, जो गाये जब्त हुई है और जो मरने के कगार पर है उन्हें कल्लु के कत्तल खाने पहुंचा दिया है और पुरा मांस अच्छी तरह से पैकिंग करवाकर विदेश भेजने का बंदोबस्त भी हो गया है, इस काम में जो रिस्क उठा रहे है ना... साला उसके ऐवज में सिर्फ खाली बोतल ही हाथ लग रही है. अंदर की दारु तो आप और आपका महकमा गटक रहा है.’’
‘‘भाईजी (देवेन्द्र के लिए सभी यही संबोधन उपयोग में लाते थे) शुक्र मनाओं खाली बोतल तो हाथ लग रही है..’ एक नजर सरीता की ओर देखा, जो जानबुझकर वहां अपना समय व्यतित कर रहीं थी. दरोगा ने पाया की जब देवेन्द्र ने सरीता की उपस्थिती पर कोई प्रतिक्रिया या चुप रहने का इशारा नही किया तो दरोगा ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘वरना जब्त कि हुई गाये कहा गई, मरने के बाद उन्हें कहा दफनाया और यदि जिन्दा है तो किसकी गौशाला में है, यह सारा हिसाब तो हमें ही सरकार को देना होता है, अब उपर के कुछ लोगों के मुंह ज्यादा खुले है तो थोडी ज्यादा उडेल जाती है, आप तो खाली बोतल बेचकर ही नशे में झुम जाओ’’
देवेन्द्र दरोगा की बात काटते हुये बोल पडा, ‘‘अरे..! क्या झुम जाओ... साला मेहनत करे मुर्गा और अंडा खाये फकीर, जैसी हालत बना दी है हमारी, कम से कम आधी भरी बोतल तो मिले’’
‘‘मुमकिन नहीं भाईजी, आप खाली में ही संतुष्ट रहो, वरना तो वह भी मिलना बंद हो जाये और फिर जो जिन्दा गाये है उनसे निकलेवाली मलाई तो आप ही खा रहे हो सिर्फ खा ही नही रहे पुरे परिवार को उसी मलाई से नहला भी रहे हो, अब और मुंह मत खुलवाओं’’
‘‘दरोगा.... आप तो धमकी दे रहे हो, वह भी मेरे ही घर में बैठकर, यहां तबादले हमारे इशारों पर होते है’’
‘‘भाईजी, इतना तो हम भी जानते है, पर यदी हम यहां से चले गये तो आने वाला कही आपकी फाईल न खोल दे जो पिछले महिने आपने शिवपुर बस्ती के फन्ने खां ने गाय काटी इसलिये उसके घर हमला करवाकर उसका कत्ल करवाया था, आपकी विडीयों है उसपर तलवार से वार करते हुये, ये सारे सबुत अगर आपके विरोधीयों के हाथ लग जाये तो जो इज्जत और रुतबा है सब धरा रह जायेगा.’’
अचानक ही देवेन्द्र ने सरीता की ओर रुख किया और उंची आवाज मे उसपर बरस पडा, ‘‘तु अभी तक यही है, साली... तेरा हुआ नहीं क्या चाय बांटकर, जा निकल कमरे से’’ सरीता को उस कमरे से निकलने के सिवा कोई ओर चारा न था, वह जान गई उसके पती को दरोगा बेईज्जत कर रहा है और देवेन्द्र उस दरोगा का कुछ बिगाड नहीं पा रहा है. वह जान चुकी थी कि, यहां संभ्रात और इज्जत से सर उठा कर जीने वाले कितने काले है, एक तरफ गाय काटने वाले का कत्ल कर दिया और दूसरी तरफ खुद गाय का मांस पैकिंग करवाकर विदेश में सप्लाई करवा रहा है. जिसमें स्थानीय प्रशासन के कुछ भ्रष्ट लोग भी उसका साथ दे रहे है.
रात में सोने से पहले देवेन्द्र सरीता को धमकाने लगा, ‘‘सरीता, आज तुने जो भी हमारी बैठक में देखा, सुना इस बात का जिक्र इस चारदिवारों के बाहर जाने का मतलब समझती हो.. तुम्हारी मौत... मुझे किसी का गला काटते कोई दर्द महसूस नहीं होता’’ थोडी देर रुककर ‘‘तुम जब भी चाय नाश्ता देने आती हो अंधी और बहरी बनकर आया करो और जितनी जल्दी हो सके वहां चाय-नाश्ता रखकर चली जाया करो, समझी’’ सरीता सारा ही मामला समझ गई थी और जान गई की चुप रहने मे ही भलाई है. औरतों के लिए यही संस्कार, यही रिती, यही रिवाज है..... चिरकाल तक खामोशी.
सरीता बेचैन थी कि इस माह उसे स्त्राव नहीं हुआ था. जब की वह हर महिने अपने माहवारी का हिसाब रखती थी उसे ऐसी ताकीद ही थी और उस घर का रिवाज भी बडी बुजूर्ग होने के नाते उसकी सांस उसके घर के सभी औरतों के माहवारी का हिसाब रखती थी. उन चार दिनों में उस औरत की परछाई भी किसी पर पड जाये तो पुरे घर में कोहराम मच जाता था. वह यह सोच ही रही थी कि, सरीता की सांस आ ही धमकी उसके सामने, ‘‘अरी.... क्या इस बार तु पिछले कमरे में नहीं जा रही है क्या ?’’ पिछला कमरा, उस घर का सबसे पिछला कमरा जिसमें एक गॅस, सिगडी, पानी का मटका और कुछ बर्तन, उसी कमरे के फर्श पर बिस्तर बिछा हुआ था. रजस्वाला स्त्री को उन चार दिनों में यहीं रहना होता था. घर के सदस्यों के उठने से पहले ही तकरीबन भोर में चार बजे उठकर नित्यकर्म निपटाकर एवं नहा-धोकर उसी कमरे में चले जाना होता था. क्योंकि घर के सदस्य भी भोर में पाँच बजे उठ जाते थे. और उनका सामना ना हो यह खबरदारी उसी स्त्री को लेनी पडती थी.
सांस के शब्द कानों से फिर टकराये, ‘‘क्यों री...? सुनाई कम पड रहा है क्या? मैने क्या पुछा तुने जवाब नहीं दिया’’
‘‘नहीं मा जी, अभी शुरु नहीं हुआ है, दो दिनों से मै भी बेचैनी महसूस कर रहीं हूं, पर पता नहीं’’
‘‘दवाखाने गई थी क्या?’’ ‘‘नहीं’’
‘‘ठिक है, मैं देवेन्द्र से कहती हूं तुझे दवाखाने ले जाये’’
‘‘मां जी और दो दिन इंतजार करते है, शायद शुरु हो जाये’’
‘‘ठिक है, पर दो दिन बाद चली जईयों’’
दो दिन क्या तीसरा भी दिन बित गया पर सरीता जिसका इंतजार कर रही थी वह नहीं हुआ. उसने हिम्मत करके देवेंद्र को उसे दवाखाने ले चलने को कहा, देवेन्द्र के कानों तक यह बात पहुंच ही चुकी थी. इसलिए उसने कोई ना.. नुकुर न करते हुये सरीता को दवाखाने ले गया. चेकअप के बाद डॉक्टर ने कहा, ‘‘बधाई हो भाई जी, बहु मां बनने वाली है’’,
‘‘कौनसा महिना है?’’,
‘‘दुसरा ही है, भाईजी’’
‘‘ठिक है, तो जांच करवा ले, लडका है या लडकी’’,
‘‘भाईजी, इस बार पुलिस कुछ ज्यादा ही सख्ती से पेश आ रही है, एक-दो जगह छापे भी पड चुके है’’
‘‘डॉक्टर साब ! आप इसकी चिंता क्यों करते हो, यहां का प्रशासन और पुलिस दोनों को जेब में लेकर घुमते है हम, पिछली बार भी किया था किसी को कुछ पता चला’’
‘‘ठिक है भाईजी, मै बंदोबस्त करवाता हूं, आप बहु को चार दिन बाद ले आईए’’
यह वही दिन था जब सरीता फर्श पर पडी सिसकीया ले रही थी और अपने नसीब को कोस रही थी, सुबह 10 बजे ही देवेन्द्र उसे दवाखाने ले गया, जहां सोनोग्राफी के बाद जब डॉक्टर ने कहा कि इस बार भी लडकी ही है तो दवाखाने से ही तमतमाया चेहरा लिये सरीता के साथ घर वापस आया था और अपने कमरे में पहुचते ही सरीता को धक्का देकर फर्श पर गिरा दिया था. गाली गलौच करते हुये उसे लात मारी थी. आधे ही घण्टे बाद देवेंद्र फिर कमरे में आया, ‘‘अरे ओ.. मनहूस अभी तक तेरा रोना बंद नहीं हुआ क्या, मेरी डॉक्टर से बात हो गई है, परसो तुझे अस्पताल में भर्ती कराना है, मुझे यह लडकी नहीं चाहिये, धुलाई कर देंगा तेरी वह डॉक्टर, तैयार रहना’’ आदेश सुनाकर फिर चला गया. देवेन्द्र के शब्द सरीता के लिये आदेश थे. वह विरोध के लिए अपने मुंह से एक शब्द भी नहीं निकाल सकती थी. उसका रुठना या रोना कुछ भी इन संस्कारी पत्थरदिलो के सामने काम न आने वाला था. यही नसीब और नियती मानकर सिर्फ दो दिनों तक कमरे में खुद को बंद कर रोने के सिवा कुछ भी न कर पाई सरीता.
आज उसे अस्पताल में भर्ती होने जाना था. पर सरीता देख रही थी घर का माहौल कुछ अलग ही है. काफी लोगों का तांता लगा हुआ था और लोग देवेंद्र को बधाई दे रहे थे. थोडी हिम्मत करके उसने अपनी ननद से पुछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, इतने लोग और इन्हें किस बात की बधाई दे रहे है’’
‘‘क्या भाभी..... आप को पता नहीं, इन दो सालों में भईयां ने तकरीबन 10000 गायों के प्राण बचाये है, इसीलिए उन्हें धर्मरक्षक सन्मान दिया जा रहा है, भईया वही सन्मान लेने जा रहे है, और आपको अस्पताल छोडने की जिम्मेदारी मुझ पर डाली है’’ सरीता अवाक थी की, ‘क्या वाकई देवेन्द्र इस सन्मान का पात्र है? पता नहीं कितनी गायों को खुद हलाल करवाकर विदेशों में बेचा है? जो इन्सान स्त्री को इन्सान नहीं मानता, जिसे लडकी एक बोझ लगती हो, धर्म और संस्कार का ढिंढोरा पिटकर जिसे लोगों के गले काटने में हिचकिचाहट नहीं होती.... वह... वह व्यक्ति सन्मान का पात्र,’ सरीता अस्पताल के ऑपरेशन रुम में पडे पडे यही सोच रही थी कि उसे इजेक्शन लगवाकर बेहोश किया गया. जब होश आया तो वह अस्पताल के बेड पर पडी थी, पेट खाली था और बाहर ढोल-ताशो की आवाज, देवेन्द्र भाई की जय के नारे गुंज रहे थे और सरीता के अंर्तमन में चल रहा द्वंद्व, विरोध की भावना, एक स्त्री होकर स्त्रीभू्रण न बचा पाने का दुःख लाचारी का रुप लेकर आँखों से बह रही थी जो उस अस्पताल के बेड के तकीये में जज्ब हो रही थी.
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अश्वजीत पाटील

 

 

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