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घर की थाली

 

 

"बेटा खाना लाऊँ" कुछ सोती कुछ जागती माँ ने बेटे से पूछा।
"नहीं माँ, मैं खाना बाहर से खा कर आया हूँ।"
"पर बेटा रोज़-रोज़ बाहर का खाना नुक़सान देता है, और पता नहीं साफ़-सफ़ाई का ध्यान भी रखते हैं या नहीं।"
"ऐसी बात नहीं है माँ, अच्छे होटलों में ऐसा नहीं होता, साफ़-सफ़ाई का भी पूरा ध्यान रखा जाता है और ये बड़े होटल कस्टमर का भी पूरा ध्यान रखते हैं।"
"कितना भी ध्यान रखतें हो बेटा पर ‘होटल की थाली’ और ‘घर की थाली’ में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है।" थके लहजे में कहती वो बर्तन समेटने लगी।

 

 


(इरम कमाल)

 

 

 

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