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कड़वी

 

सुबह के पांच बज रहें थे लेकिन उठकर चाय बनाने का बिलकुल मन नहीं कर रहा था | रात में कबीर के साथ हुई बहस से सिर एकदम भारी हो रहा था | जरा सी गर्दन घुमा कर बराबर सोए हुए अपने पति कबीर को देखा तो उनके चेहरे पर कोई भी भाव नहीं था ,बस नींद में अपने ही ख्वाबों की दुनिया में खोये हुए थे |आज हमारी शादी को सात साल हो गए हैं ,मैंने दो प्यारी बेटियों को जन्म भी दे दिया है लेकिन कबीर और उनके घरवालों को खुश नहीं कर सकी हूँ| मैं आज तक अपने पति कबीर के व्यवहार को समझ नहीं सकी क्योंकि वो एक आधुनिक जीवन शैली को जीते हुए भी पुरानी सोच को मरने नहीं दे रहें थे | कबीर एक नामी कंपनी में वकील के रूप में कार्य करते हैं और दिनभर मुकद्दमे सुलझाने में लगे रहते है लेकिन अपने जीवन की छोटी से छोटी बात का फैसला लेने में असमर्थ है | आजकल घर में हरवक्त सिर्फ एक ही विषय पर बहस हो रही है कि एक बेटा तो होना ही चाहिए ताकि वंश का वृक्ष बढ़ाया जा सके लेकिन मैं इस के लिए कतई तैयार नहीं थी और होती भी कैसे ,कुछ महीने पहले हुए घटना ने मेरे तन और मन दोनी को तोड़ कर जो रख दिया था | मेरी एक मनाही ने सारे परिवार को नाराज़ कर दिया था ,अपने ही घर में सांस लेना दूभर हो रहा था | ये तो शुक्र है कि मैं सरकारी स्कूल में अध्यापिका थी वरना खराब वातावरण का असर चार गुना ज्यादा ही होता |

 

"अरे खुशबू ,सुबह हो गयी है ,जरा चाय बना दे | आज तो मेरे घुटने टूट कर ही मानेंगे ,हाय मेरा दर्द कौन समझता है इस घर में ..........." | कमरे के बाहर से आवाज़ आई |

 

ये मेरी सास की आवाज़ थी जो सुबह सुबह अपने छुपे हुए दर्द की घोषणा कर रही थी ,ये घुटने का दर्द नहीं था बल्कि मुझ पर कसा हुआ एक तीखा ताना था कि मैंने उनकी बात नहीं मानी |

 

"जी आई माजी " मैंने फटाफट बिस्तर छोडकर अपने बाल सवाँरे और हाथ मुहँ धोकर बाहर निकल आई और अपने सास ससुर के पाँव छुए और रसोई के काम में जुट गयी |

 

चाय बनाकर अपनी सास को दी और अपनी दोनों बेटियों को सोते से उठाया और उन्हें प्यार से चूमा | मेरी दोनों बेटियाँ जुड़वाँ पैदा हुई थी और मेरी खुशी का एकमात्र कारण थी | कबीर का ऑफिस घर पर ही था और उन्हें उठने कि कोई जल्दी नहीं होती थी | मैंने अपनी बेटियों के नाम रिद्धि और सिद्धि रखे थे लेकिन मेरी सास ने इस पर भी ताना मारा था कि लड़कियाँ तो खजाने घर से बाहर लेकर जाती है ,लेकर नहीं आती |

 

रोज की तरह मुझे स्कूल के लिए देर हो रही थी ,रिद्धि और सिद्धि की स्कूल बस आ चुकी थी और मुझे भी दस मिनट में स्कूल के लिए निकलना था | सब काम निबटाकर मै भी अपनी स्कूटी निकल कर घर से बाहर आ गयी |

 

थोड़ी देर बाद मैं स्कूल के प्रांगन में खड़ी थी | स्कूल के विद्यार्थी आते जाते हुए अभिवादन कर रहें थे | स्कूटी को ताला लगाकर मैं स्टाफ रूम में चली गयी | अपनी साथी अध्यापिकाओं से मिलने के बाद ,आज स्कूल में होने वाले समारोह पर चर्चा शुरू हो गयी |

 

"अरे खुशबू , जो नाटक तुमने तैयार करवाया है ,उसकी सारी तैयारी हो गयी क्या ? तू एक बार जाकर स्टेज़ देख लेती ,सर ने कहा है कि समारोह दस बजे शुरू हो जाना चाहिए |" निर्मला के चेहरे पर बैचनी साफ़ झलक रही थी क्योंकि उसे मंच सँभालने का कार्य जो दिया गया था | निर्मला गणित की अध्यापिका थी और मेरी सबसे अच्छी सहेली भी |

 

" निर्मला ऐसे घबरा मत ,नहीं तो तू अपने गणित के सारे सूत्र भूल जायेगी ,अगर ऐसा हो गया तो बच्चों को क्या पढ़ाएगी | " निर्मला की घबराहट दूर करने के लिए मैंने एक मजाक भरी चुटकी ली | इस बात पर दूसरी अध्यापिकाएं भी जोर से हँस पड़ी |

 

घडी में दस बजने के बाद कार्यकर्म शुरू हो गया और निर्मला ने मंच संभाल लिया | मैंने जाकर छात्राओं को नाटक के लिए तैयार किया | असल में इस नाटक के बहाने मैंने अपने दर्द की अभिव्यक्ति ही की थी | लड़कियाँ मंच पर जाकर नाटक प्रस्तुत करने लगी जिसका नाम मैंने 'कोख' रखा था | मैं मंच के एकतरफ खड़ी होकर अपने जीवन की उस दुखद घटना की स्मृतियों में खो गयी जो इस नाटक का आधार थी | जिस मजबूती से मैंने भ्रूण हत्या पर आधारित ये नाटक कोख लिखा उससे कहीं अधिक कमजोर मैं तब पड़ गयी थी जब इस कड़वी वास्तविक घटना की मैं खुद एक लाचार सी नायिका थी | रिद्धि और सिद्धि के जन्म के चार साल बाद जब मैं दोबारा गर्भवती हुई तो कबीर ने कुछ समय बाद अपने माँ बाप के कहने से अल्ट्रासाउंड की जिद्द पकडनी शुरू कर दी और मुझे मजबूरन उसकी जिद्द के आगे झुकना पड़ा | लेकिन इस जिद्द का परिणाम मेरी कोख में पल रही उस नन्ही कली को भुगतना पड़ा जिसे कबीर और उसके माँ बाप इस दुनिया में नहीं आने देना चाहते थे | कबीर ने बड़े कड़वे शब्दों में इस जिम्मेदारी को उठाने से मना कर दिया और उनकी वो कड़वाहट आज तक मेरे सीने में गर्म लावे की तरह फूटती रहती है और जिसकी आंच में हम दोनों का मधुर रिश्ता झुलस कर रह गया है |

 

अचानक तालियों की गडगडाहट से मेरी विचार तन्द्रा भंग हुई ,सारी अध्यापिकाएँ नाटक के शानदार प्रस्तुतिकरण पर मुझे मुबारक दे रही थी और मुझे गर्व से देख रही थी लेकिन मैं भीतर ही भीतर अपनी शर्म और पश्चाताप से गड़ी जा रही थी लेकिन सामजिक आचरण की पूर्ति के लिए मुस्कराने का दिखावा भी करना जरूरी था | तभी मुझे पीछे से किसी ने आवाज़ लगाई...."मैडम जी ,थोड़ा पानी पी लीजिए " मैंने सकपका कर जल्दी से अपने आंसू पोंछे और मुड़कर देखा |

 

" अरे सत्तो तू है ,बेटी कैसी है तुम्हारी ?" सत्तो हमारे स्कूल की चपरासी थी और छुट्टियों पर गयी हुई थी क्योंकि उसे बच्चा पैदा होने वाला था |

 

"बस ठीक ही है मैडम जी ,खर्चे ही बढ़ गए है| "सत्तो बड़ी उदास लग रही थी |

 

उसकी उदासी का कारण मैंने भांप लिया था क्योंकि उसे ये चोथी बेटी पैदा हुई थी |

 

लेकिन मैंने बात बदलने की कोशिश की "और क्या नाम रखा तुमने बेटी का "?

 

" मैडम जी मैंने तो सपना रखने की सोचा था पर उसका बापू तो उसे कड़वी ,कड़वी कहकर बुलाता है |"सत्तो अपनी ही बात पर खिसिया सी गयी थी |

 

" क्या कहा ,उसका नाम कड़वी रख दिया !" सुनकर मेरा हृदय टीस से भर गया |

 

सत्तो तो पानी पिला कर चली गयी लेकिन समाज के सोच की धरती कितनी बंजर हो गयी है जो अब लड़की को एक सुंदर सा नाम भी नहीं दे सकते ,सुंदर जीवन देना तो बहुत दूर की बात है | उस समय मुझे खुद की और सत्तो की स्थिति में कुछ अंतर नजर नहीं आया ,कुछ अंतर था तो बस इतना कि उसके पति ने अपनी बेटी का नाम कड़वी रख दिया था और मेरी बेटियों को मेरे पति ने नाम भले ही सुंदर दे दिया था लेकिन वास्तविकता उनको भी कड़वी ही दी गयी थी जो उन्हें बेटा न होने के कारण बोझ समझा जा रहा था |

 

वैशाली भरद्वाज (pichu sharma)

 

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