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मन की शान्ति

 

एक समय की बात है, एक साधु हिमालय की पहाड़ियों में रहकर मन की शान्ति प्राप्त करने के लिए घोर साधना कर रहा था।
दिन, हफ्ते, महीने, साल गुज़रते रहे लेकिन उसे मन की शान्ति नहीं मिल पा रही थी।
एक दिन की बात है वह साधु पूजा अर्चना के बाद अपनी कुटिया में आया और कंदमूल खा कर सो गया। रात को उसके सपने में भगवान ने दर्शन दिए और कहा- "हे पुत्र, तुम इतने उदास क्यों रहते हो? इतनी पूजा अर्चना के बाद तो तुम्हारा मन प्रसन्न होना चाहिए ?"
साधु बोला- "पता नहीं क्या बात है, मुझे जो सच्ची ख़ुशी चाहिए वो नहीं मिल पा रही है जिसकी तलाश में अपने परिवार को छोड़ कर मै यहाँ आया हूँ।
भगवान मुस्कुराए और बोले- "तुम मनुष्य बड़े नादान होते हो, ये नहीं समझते कि पूजा अर्चना से ही किसी को मन की शान्ति नहीं मिल जाती। मन की सच्ची ख़ुशी, शान्ति को पाना चाहते हो तो अपने उन कर्त्तव्यों को पूरा करो जो तुम्हे सौपे गए हैं। "
साधु बोला- भगवन्, मै अब भी नहीं समझा।
भगवान बोले- "जाओ अपने परिवार के पास और जो कर्त्तव्य तुम्हारे परिवार के प्रति तुम्हारे हैं, उन्हें पूरा करो। तुम्हारे बिना तुम्हारा परिवार परेशान है, एक तुम ही अकेले परिवार के मुखिया हो , कमाने वाले हो, तुम्हारे बच्चे खाने पीने को परेशान हैं, तुम्हारे बूढ़े माता पिता तुम्हारी राह देख-देख कर थक गए हैं। तुम अपने पीछे इतने लोगों को परेशान छोड़ कर आये हो और फिर भी मन की शांति पाना चाहते हो?"
इतना कहकर भगवान खामोश हो गए।
साधु बोला- "किन्तु भगवन् क्या पूजा पाठ, साधना सब व्यर्थ है?"
भगवान बोले - "नहीं, ऐसा मैंने कब कहा? पूजा पाठ करना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। परन्तु जो कर्त्तव्य, जो दायित्व, जो ज़िम्मेदारी एक मनुष्य होने के नाते उसे सौंपी गयी है उसको भूलकर, या उससे भागकर, या उससे मुँह चुराकर जो पूजा पाठ या साधना की जाती है भगवान भी उससे ख़ुश नहीं होते और न ही मनुष्य को मन की शान्ति मिलती है। "
इतना कहकर भगवान चले गए और साधु की आँख खुल गयी।
उसे अपने दायित्वों का एहसास हो गया था और वह अपनी राह यानी अपनी परिवार, अपने माता पिता के पास जाने के लिए चल पड़ा। सच्ची मन की शान्ति पाने के लिए। जहाँ पूजा अर्चना साधना तो थी ही, साथ ही था अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने का एहसास।

 

 


(इरम कमाल)

 

 

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