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वो नन्ही सी दुल्हन

 

 

इतनी सुबह सुबह ढ़ोल ओर गीतो के बजने की आवाज ने आज मुझे जल्दी उठने पर मजबूर कर दिया मे उठ के सीधा ही माँ के पास गया , माँ रसोई घर मै चाय बना रही थी , मुझे देख के उन्होने कहा । अरे तू जल्दी उठ गया आज ,माँ ये कहा बज रहे है गीत आज इतनी सुबह सुबह , अरे वो गली के कोने वाला घर है ना वही ओर माँ अपने काम मै वापस लग गयी | मै उन से वापस पूछने लग गया अरे पर वहा है क्या ऐसा , उनकी लड़की की शादी है ना ओर माँ यह कहते हुए सब उठाने बाहर चली गयी , इधर मेरी नींद से भरी आंखे एक दम से मानो जाग उठी हो ओर चाय के बिना जो कभी ठीक से खुलती नहीं थी पर इतना सुनते ही मानो मुझ पर किसी ने आज बाल्टी पानी की उड़ेल दी हो |

 

मै वही खड़ा सोचने लग गया यार दो दिन पहले ही तो उसे देखा था ओर आज उसकी शादी हो जाएगी , आखिर उम्र ही क्या होगी उसकी शायद 13 -14 साल , तभी माँ भी वापस आ गयी ओर लोटा देती हुई बोली जा मुह धो ले ओर चाय पी लेना | मै लोटा लिए बाहर आँगन मे आ गया , आंखों से नींद तो अब कोसो दूर थी हजारो सवाल मुझे घेरने लग गए थे | वो लड़की जो 13 – 14 साल की लग रही थी क्या वो शादी के काबिल है |

 

कुछ देर बाद सभी घर वाले बाहर आँगन मे आ गए , तब तक पिताजी भी उठ गए थे , मे अभी भी वही लोटा लिए बैठा रहा , माँ ने मुझे चाय भी वही लाकर दे दी |मे वो चाय की प्याली लिए पिताजी के पास जा बैठा , कुछ देर चुप चाप बैठे रहने के बाद आखिर मेने पिताजी से पूछ ही लिया की क्या पापा इतनी 13 14 की कम उम्र मे किसी लड़की की शादी हो सकती है , पिताजी जहा समाज की परम्पराओ से वाखिफ थे वो ना जाने क्यू आज मेरे अंतर्मन मे झाक गए ओर मेरे सब सवालो को मानो एक ही पल मे पड़ लिए हो |

 

अंदर की ओर जाते हुए इतना कहा मुझ से की ये हमारा मसला नहीं है , हम दूर रहे तो ही अच्छा है |

 

ना जाने क्यू आज माँ की वो मीठी चाय बड़ी कड़वी लग रही थी , कोई मुझे अंदर से कुरेद रहा हो मानो की नहीं मुझे कुछ करना चाहिए ,मगर पिताजी के उत्तर ने मुझे क्षण भर मे ही सम्पूर्ण रूप से क्षीण कर दिया था |

 

वो कड़वी चाय अब अंदर जाकर जहर का काम कर रही थी , मानो हर घूंट के साथ वो मुझे अंदर ही अंदर काट रही हो , चाय अब प्याली से खत्म हो चुकी थी फिर भी मे वही हजारो सवालो की भीड़ मे अकेला खड़ा था , सब मुझे नोच रहे थे ,तो कोई धिकार भी रहा था |

 

किसी ने आकार मुझे जब तक जंकझोरा नहीं तब तक मै वही बैठा रहा , वो भाई ही था जिसने मुझे हाथ से हिलाते हुए वहा से उठाया ओर रसोई घर की ओर इसारा करते हुए , माँ की मदद करने को कहा |

 

मै किसी डूबते हुए सूरज की भांती निराश सा रसोई घर की ओर बड़ रहा था

 

 

अजनबी राजा

 

 

 

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