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पछतावा

 

 

वो तेज़ क़दमों से चला जा रहा था। चाल में मानो बिजली भर गयी थी। वो जल्द से जल्द इस जगह से दूर चले जाना चाहता था।
जो काम वो कर आया था उसका नतीजा बस आने ही वाला था। रेलवे स्टेशन अब उसकी नज़रों से दूर होने लगा था, हलक़ में अटकी सांस बहाल होने लगी थी।
घर सामने ही था। दरवाज़ा खुलवाना नहीं पड़ा, वो अन्दर दाख़िल हुआ।
उसे माँ और पत्नी के रोने की आवाज़ें सुनाई दीं। टीवी पर थोड़ी ही देर पहले हुए बम ब्लास्ट की ख़बर चल रही थी।
तभी उसकी पत्नी रोते हुए आयी और बोली- "सुनो रवि के पापा, आज रवि भी इसी समय आने वाला था।"
इतना सुनते ही वो दीवार के सहारे बैठता चला गया।
आज उसने अपने ही हाथों अपने घर का इकलौता चिराग़ बुझा दिया था।

 

 


(इरम कमाल)

 

 

 

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