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शिखर की खुशी


शिखर एक अच्छा लड़का था। वह जल्दी उठता, अपने माता-पिता के पैर छूता उसके बाद दिनचर्या के काम निपटाता। प्रतिदिन सही समय पर विद्यालय जाता और वहां पूरे मन से पढ़ता। छुट्टी होने पर सीधे घर आता। घर पर भी आकर उसका कार्य व्यवस्थित था। अपना बस्ता सही स्थान पर रखता, उसके बाद हाथ-मुहं धोकर भोजन करता।

शिखर की दिनचर्या व लगन देखकर उसके माता-पिता भी प्रसन्न थे। वे उसके लिये अच्छी-अच्छी बातें सोचा करते। जब भी समय मिलता ज्ञानपरक बातें बतलाते। उसकी हर जिज्ञासा शान्त करते। कभी-कभी उद्यान व शहर भी घुमाने ले जाते।

इसीलिए अपने आस-पास के पेड़-पौधेां, नदी-झरनों, पशु-पक्षियों व रहन-सहन की उसे पूर्ण जानकारी थी। शिक्षकों के साथ-साथ माता-पिता भी उसकी कठिनाईयों का समाधान करते। वह दूरदर्शन पर हमेशा शिक्षाप्रद कार्यक्रम देखता जिसके माध्यम से उसे अच्छी- अच्छी जानकारियां प्राप्त होती। पिताजी भी उसके साथ बैठते जो समझ में न आता वह उन्हीं से पूछता। रात में सोते समय भी पिताजी उसे अच्छी- अच्छी बातें बतलाते। वे कहते हमें दीन-दुखियों की सहायता करनी चाहिए।

शिखर के पिताजी एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। उनका स्कूल पहाड़ी क्षेत्र में था। वहीं से थोड़ा आगे बढ़कर छोटे बच्चों का विद्यालय था। जिसमे शिखर अपनी बड़ी बहन शिखा के साथ पढ़ने जाता। उसकी प्रतिभा विद्यालय में भी फैली थी। विद्यालय का कोई आयोजन, प्रतियोगिता खेलकूद आदि हो शिखर अवश्य भाग लेता और उसे पुरस्कार भी मिलता।

कुछ दिनों से शिखर एक बालक को एक पेड़ के नीचे पड़ी चट्टान पर बैठे प्रतिदिन देखता। वह अपनी बकरियां चराने वहीं आता। बच्चों को

पीठ पर लदे रंग-बिरंगे बस्तों को वह एकटक निगाह से देखा करता। बच्चों की लम्बी फौज फिर प्रार्थना की घ्ंाटी, प्र्रार्थना हेतु बच्चों का लगना। सब कुछ
वह बड़े ध्यान से देखता। कभी-कभी प्रार्थना के बाद भारत माता की जय की आवाज पा वह भी अपना हाथ ऊपर कर देता। पर उसकी आवाज सुनायी नहीं पड़ती। वह बोल नहीं पाता था; लेकिन उसकी आंखों में पढ़ने और बच्चों के साथ खेलने की इच्छा अवश्य थी।

एक दिन जब सभी रात को दूरदर्शन देख रहे थे। शिखर ने अपने पिता जी से कहा-
‘‘ पिताजी एक बालक विद्यालय के सामने बैठा हमें देखता रहता है। न मालूम उसकी क्या मजबूरी है? क्यों न हम उसकी सहायता करें।’’

ठीक है बेटा! पहले उसके माता-पिता का पता लगाओ। फिर सोंचेंगे उसकी क्या सहायता कर सकते हैं, पिताजी ने शिखर को समझाया। दो-तीन दिन बाद ही रविवार की छुट्टी थी। उसी दिन शिखर व उसके पिताजी उस लड़के के घर गये , घर जाने पर पता चला ; कि उसका नाम रमेश है। उसके पिताजी बहुत पहले किसी बीमारी से मर चुके थे। घर पर अकेली मां है। बकरी पालना ही उनका मुख्य व्यवसाय है। यही उनके परिवार की आजीविका का मुख्य साधन है। पैसे और जानकारी के अभाव में रमेश की चिकित्सा नहीं हो पा रही है। शीघ्र ही शिखर ही शिखर के पिताजी ने समाज कल्याण बोर्ड में आवेदन कर उसकी चिकित्सा के लिए धन स्वीकृत करवाया और रमेश को अपने साथ दिल्ली ले गये।
लगभग छः महीने की गहन चिकित्सा के बाद रमेश ठीक से बोलने लगा। वह प्रसन्न था ; कि वह भी अब विद्यालय पढ़ने जायेगा।
जुलाई में रमेश का विद्यालय में प्रवेश करवा दिया गया। उसकी मां प्रसन्न थी ही, सबसे अधिक खुशी शिखर को हो रही थी। कि एक बालक के जीवन का अंधकार अब पूर्णतः दूर हो गया था। शिखर को अब एक और नया साथी मिल गया था।
सम्पर्कः-दुबौला-रामेश्वर-262529,पिथौरागढ़ ,मोबा.9410985048,

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