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मैं तुम्हारी नहीं हूँ

 

 

“तुम मेरी हो जहाँआरा!....केवल मेरी...”...इस खण्डहर में फूले हुए लाल पलाश के गज़रे साक्षी हैं।
“भूलते हो अनिकेत! तुमसे पहले मैं किसी और की हूँ, ये खण्डहर मौत के अंगरक्षक हैं । इनमें अब उल्लू बोलता है। क्या यह कभी हमारे अरमानों सा रंगमहल न रहा होगा अनिकेत! फूले-फूले लाल पलाश कभी अंगार भी बन सकते हैं और तुमसे पहले मैं किसी और की भी हो सकती हूँ।”
“नहीं!!!!...” सहम उठा था अनिकेत ।
“दुनिया की यह बेरोकटोक गति शाश्वत नहीं है अनिकेत! इसे रुकना है, यह शोरगुल जो कानों के पर्दे फाड़ रहा है कल खामोशी की उस हद तक पहुँच जायेगा कि आवाज़ के लिए तरसेगा । शरीर कि परिधियों और मन की पहुँच तक हम एक दूसरे के हैं मगर उसके परे मैं किसी और की और तुम किसी और के...।”
“फिर भी विश्व तक तुम ..”
“तुम्हारी हूँ अवश्य ....., परन्तु, यह दुनिया एक आँख से बनती सी दिखती है तो दूसरी से उजड़ती हुई ..”
काँप उठा था अनिकेत ।
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और एक दिन पलाश के गज़रे मोहक बन उठे । सिंदूर की लाली में दाम्पत्य सूत्र अरुण हो उठे। अनिकेत अब एक क्लर्क था मगर पहले से कहीं सुखी–संतुष्ट । और यूं ही वक़्त का पहिया घूमता रहा और घूमता रहा...शोख़ लम्हों को जिंदगी में खता की तरह समेटता चला गया ।
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रोज़ की तरह आज भी
शोर.... शोर.....
और दुपहरिया के अलाव तक पहुंचता दिन । धरती से उठती गर्मी की लपटें...मानों आग का उफनता दरिया!!!
ऑफिस की खिड़की और सात मंज़िल नीचे चौड़ी सड़क । शोर.... शोर..... और ताबड़तोड़ पैरों, खुरों, पहियों की आवाज़ें..... घण्टियाँ और हॉर्न...लाल, हरी, पीली बत्तियों का बारी-बारी जलना, बुझना...पैरों, खुरों, पहियों का रुकना और चलना ।
इसी माहौल में अनिकेत का कल्पनालोक फलता रहा ।..... कभी उजाला हो जाता, आँखें चुँधिया जातीं इस कदर कि दोनों हाथों से चेहरा भिंच जाता तो कभी ऐसा घुप्प अँधेरा कि आँखों की पुतलियाँ कुछ दिखने की कोशिश करते सीमा तक फैल जातीं । परन्तु सब व्यर्थ ..!
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व्यर्थ सब व्यर्थ ..! बैठे बैठे ऊँघने लगना और झपकी का आ जाना । परन्तु अवचेतन का न सोना और न सोना । गली गली से पुकारें, मानस के गलियारे .... दूर दूर से आता हुआ कर्णभेदी कागरव, अँधेरे से उजाले में और उजाले से अँधेरे में खो जाने को आतुर गलियाँ, आलीशान इमारत के बगल में खण्डहर; जहां उल्लू बोल रहा है.... हूऊ ऽऽऽ!.... हूऊ ऽऽऽऽ!•••
रात..... गहराती रात!..... दिन की रात और...और गहराती रात!.....इमारत और खण्डहर और
.... हूऊ ऽऽऽ!.... हूऊ ऽऽऽऽ!•••
चुपके से इमारत की खिड़की का खुलना और आती हुई उलूक ध्वनि की ओर किसी भारी चीज का फेंका जाना , फट्-फट् करते हुये उल्लू का आश्रयहीन होकर उड़ जाना । खिड़की का बंद होना । यानी इमारत के बगलगीर खण्डहर में कुछ नहीं न रह सकता ।
फिर दूर कहीं से...
.... हूऊ ऽऽऽ!.... हूऊ ऽऽऽऽ!•••
नींद का खुल जाना । अगल बगल ऑफिस के सभी बाबुओं का मुस्कराभर देना और फाइलें टटोलने लगना । आँखों का उनींदेपन से लाल होना और उस लाली को स्वयम् न देख पाना । इधर उधर देखकर बेतकल्लुफ़ होकर सिर मेज़ पर रखकर सोना .... चपरासी का मेज़ पर कुछ और फाइलें रख जाना ... ।
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नींद के आगोश में फिर ....
हूऊ ऽऽऽ!.... हूऊ ऽऽऽऽ!•••
कब्रगाह !... हरी-हरी घास .... लाल-लाल पलाश... और चूने की सफ़ेदी में क़ब्रें .... खुदे हुए नामों की स्पष्टता या अस्पष्टता से समय का अनुमान लगाया जाना कि अमुक नई है और अमुक पुरानी । यादों के मानिंद या बड़प्पन के लिए तन के सुपुरदे ख़ाक होने पर नामों का खुदना .... किसी अपने के लिये यादों के कैक्टस का लगाया जाना । जीवन महल की वीरानगी के प्रतीक ....

घुप्प स्याह अंधेरा .....ट्रिङ्ग...... ट्रिङ्ग.... ट्रिङ्ग......
आँख का खुलना... व्यर्थ! ..सब व्यर्थ ..! आँख का लगना और ... दूर आकाश में मुक्तामाला की टूटी लड़ियाँ और बिखरे माणिक्य ..... अस्ताचल में रोता हुआ उजेरा ।
एक सजीला महल, खिड़कियों से उपजती हुई मन माधुरी ध्वनि....और अचानक एक नई खुदी कब्र का उभरना जिसके पास हरी-हरी घास अभी नहीं उगी है और नाम पढ़ने से पहले ही ..किसी का मेज़ से टकराना..नींद का टूटना और एक बार फिर नींद का उभरना..गहराना ... स्वप्निल सा संसार ...
एक पलाशवन.... लाली ही लाली.... बेरोकटोक वन के बीहड़ में चलते चले जाना और चारों ओर दूर-दूर तक लाल-लाल पलाश के गजरे ....एक महल और एक पलाशवन ..... अचानक धुंधुआते हुये पलाशवन का जल उठना....बड़वाग्नि का भीषण कहर ... सायों का फिर-फिर उभरना... सरकना...और ढेर हो जाना । एक छटपटाहट का आर्तनाद सुनायी पड़ना । एक प्यासी सी आह... नारी का करुण स्वर ...कब्र का हिल उठना और हड्डियों का ढेर नज़र आना.... एक नव यौवना का कब्र से निकलना और दौड़ कर उसको आलिंगन में बांधना कि ..... हाथों में फाइलों का गट्ठर आना ....
सचमुच अब नींद टूट चुकी थी । चेहरे पर गहरी उदासी तारी हो गई थी । हाथ फाइलों पर पेन के सहारे खिसकने लगे हैं और कालशिला पर अहोरात्र घिस रहे हैं । उसे लगा – वह अपनी ही लाश को ढोकर ले जा रहा है । अब तक सायों का पीछा कर रहा है । पलाशवन में दूर कहीं अकेला छूट गया है और खण्डहर के पलाशवन से कोई पुकार रहा है …. “मैं तुम्हारी नहीं हूँ”.....।
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प्रो0 बी0 डी0 इन्दु

 

 

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