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सोलह दिसम्बर

 

 

कौन कहता है
यज़ीद मर गया
यज़ीद आज भी ज़िंदा है
आइये
मैं आपको ले चलता हूँ
पाकिस्तान के शहर पेशावर में
जहाँ
यज़ीदे वक़्त के हुक्म पर
इस दौर के हुरमुलाओं ने
इस्लाम के खुद साख्ता मुल्लाओं ने
सैकड़ों मासूम फूलों को मसल दिया
सैकड़ों नाज़ुक कलियों को कुचल दिया
सैकड़ों घर वीरान हो गये
दीवार और दर लहूलुहान हो गये
सैकड़ों माँओं की गोदियाँ उजड़ गयीं
बाप की आँखों से बीनाइयाँ बिछड़ गयीं
मगर
यज़ीदे बे हया
कल की तरह आज भी
अपने दरबार में
अपनी जीत का जश्न मना रहा है
उसके लोग
गलियों और बाज़ारों में
शहनाई और नक़्क़ारे बजा रहे हैं
और इन्सानियत खून के आँसू रो रही है।

 

 

- हाशिम रज़ा जलालपुरी

 

 

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