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अधूरी ख़्वाहिश

 

 

यादों के घने बादल में
छुपे चाँद को देखना
ख्वाबों के महकते चमन में
हर एक फूल को सजाना
समंदर किनारे बैठकर
बलखाती लहरों के साथ
बीते सुनहरे पलों को
याद करते हुए
मन ही मन मुस्काना
कितना सुखद लगता है
यह जानते हुए कि
वह नहीं है पास अब
सिर्फ अहसास है इर्द गिर्द
फिर भी जी लेता है कोई
पलभर में -
अपनी सारी जिंदगी
इस उम्मीद के साथ कि
आज न सही फिर कभी
पूरी होगी उसकी तमना की
वह अधूरी ख्वाहिश
जिसकी तस्वीर लेकर
लिखता रहा तहरीर अब तलक
शबनम के हर बूँद में
उसकी परछाई पाकर
और फिर खो जाता है
यादों के उसी घने बादल में...

 

 

 

प्रकाश यादव "निर्भीक"

 

 

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