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* आजकल *

 

आजकल ….
जो कुछ भी हो रहा है
बहुत सही हो रहा है
शायद पाप का घागर
अभी भरा नहीं है
सो पाप का घागर
सबसे भराया जा रहा है
सूत्रधार है एक
जिसकी नजर है घागर पर
आजकल ….
सब उलट-पलट चल रहा है
नहीं...
उअलट-पलट चलाया जा रहा है
अन्तिम समय तक किसी को
उठने और उटाने का हक नहीं
सबकुछ चुपचाप सहते हैं
आजकल जहर को भी
अमृत मानके पीते हैं
आजकल असहाय जिन्दगी को भी
बेहतर मानके जीते हैं
शायद कोई चारा नहीं है
आजकल खुली आँख सोते हैं
तरस न आये किसी को
गम छिपाके भी हँसते हैं
आजकल ....
आस है सिर्फ
घागर ब्भरने की
सिर्फ घागर भरने की॥

 

श्री सुनील कुमार परीट

 

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