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कश्मीर के आँगन की माँटी

 

 

- सुधीर कुमार सिंह ‘प्रोग्रामर’

 

 

 

हे धर्मवीर, हे कर्मवीर, हे महावीर हे ज्ञानवीर
हे गंग-नीर, हे कर्ण-तीर, हे पर्ण-पीर लेखन वजीर
लालित्य वोध साहित्य लिखा़े, नव भारत की तकदीर लिखो
अब डेग-डेग कष्मीर लिखो, हो विजय श्री रणवीर लिखो,
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जितनी रातें उतनी बातें, कुछ बात बताना चाहेंगे
दर्पण रखकर उन दुष्मन को, औकात बताना चाहेंगे,
कष्मीर कौन बैताल गये, हर साल सैकड़ों लाल गये
कुछ गामों के बूढ़े बच्चे, कुछ माँ संग नौनिहाल गये
अबतक क्या क्या खोया पाया, चल बैठ जरा गणना करले
दोनों के बीर जवानी में, कब कहाँ मरे गणना करले
रे पाक नपाक जरा देखो, कब्रों में करूणा क्रंदन है।
कष्मीर के आँगन की माटी, भारत के माथ का चंदन है।।
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भारत माता हर आँगन के, भीतर-बाहर में रहती है।
अब नंगा नाच नहीं होगा, जिस देष में गंगा बहती है
हम आग बुझाने वालें हैं, हम आग लगाने ना देंगे
कष्मीर है भारत माता की, अब दाग लगाने ना देंगे
हम काले धंधे वालों को, अब लाग लगाने ना देंगे।
ये पत्रकार ये कलाकार, मत कलमांे का ब्यापार लिखो
हेयुग निर्माता कलमकार, हर मानव का उद्धार लिखो
इस माँटी के अमर लाल के, पूज्य पाद का वंदन है
कष्मीर के आँगन की माटी, भारत के माथ का चंदन है।।
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जब जब तू आँख उठाया है, हमने पहले समझाया है
तुमको समेटकर मुठ्ठी में, लाहौर किनारे लाया है।
जो चढ़ा रहा पानी तुमपर, देखेंगे कितना पानी है
इस बार जान लो ये पागल, निष्चय ही खतम कहानी है
संकट गर विकट खड़े हों तो, कन्या कष्मीर खड़े होंगे
लाहौर में झंडा पहरेगा, बच्चे जब जाग खड़े होंगे।
वीरों की खेती करते हम, बलवीर भरा ये नंदन है।
कष्मीर के आँगन की माटी, भारत के माथ का चंदन है।।

 

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