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अभिशप्त आत्मा का रचनाकार

 

 

सामने वाले का
प्रश्न-
आखिर मैं
रचनाकार/लेखक क्यों बना-?
क्या मैं-महापुरूष,
बड़ा शासक या देवतुल्य
महामानव सदृश बनकर भावी
पीढ़ी को अपने पद चिन्हों
पर चलने का मिशाल
बना रहा हूँ
आने वाली पीढ़ी मुझे
आदर्श मानकर मेरे पदचिन्हों
पर चले।।
उत्तर में मैं कहता हूँ-
नहीं ! मेरी कोई ऐसी
इच्छा नहीं है।
मैं महापुरूष, ‘आदर्श-मानव’
और बड़ा शासक नहीं
बनना चाहता।।
मैं, मात्र एक लेखक/रचनाकार
ही बना रहना चाहता हूँ।
महत्वाकांक्षी तो हूँ ,
परन्तु यह नहीं चाहता
कि भावी पीढ़ी के लोग मेरे
पदचिन्हों पर चलें।
इसलिए कि-
भविष्य का क्या? कब पलट जाये
लोगों की संवेदनाएँ
समाप्त हो जाएं लोग संज्ञाहीन होकर
आपसी राग-द्वेष के प्रभाव
में आ जायें
भविष्य का क्या???
मैंने भी किसी को अपना
आदर्श नहीं माना है।
तब लोग मुझे आदर्श मानने की
गलती क्यों करेंगे?
लेखन मेरा शगल है मैं मानव
सभ्यता और उसके चरित्र
का तटस्थ आलोचक हूँ।
भूत-भविष्य और वर्तमान पर
दृष्टि रखता हूँ।
मैं पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश
और जल
के साथ रहता हूँ।
चूंकि मानव की रचना
इन्हीं पाँच तत्वों को
मिलाकर किया है।
इसलिए मैं एक सम्पूर्ण
मानव बनकर ही लेखन कार्य करता हूँ।
अनगिनत आयामों और
भंगिमाओं से भरपूर विरोधाभासों
के साथ महापुरूष ही जीते है।
मैं ऐसा नहीं बन सकता
मुझमें ऐसे कोई गुण नहीं
जो- इनमें होते हैं,
वे महान हैं, और मै-
महान नहीं हूँ। ऐसा बन भीं
नहीं सकता हूँ।।।
मैं चिन्तक-विचारक दार्शनिक
भीं नहीं हूँ। मानव के
सभीं गुण मुझमें मौजूद हैं।
हर्ष-विषाद, राग-द्वेष सभीं तो है
मेरे व्यक्तित्व के अन्दर।
मैं कोई अवतार-पुरूष भीं नहीं
बनना चाहता। शायद चाहकर भीं
ऐसा हो पाना असंभव ही होगा।
जब मुझे क्रोध आता है
और मैं दुःखी हो उठता हूँ-
मेरा लेखन प्रखर होता है।
तनावों से घिरने पर
लेखनी चलती है,
वह बोल उठता है-
अनन्त तनावों और चिन्ताओं
से भरी हुई अपनी
‘अभिशप्त आत्मा’ के रचनाकार
तुम्हीं तो हो।।।

 

 


-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

 

 

 

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