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आदर्श टुटपुँजहे

 

 

जानलेवा हर तरह अहसास भयभुतहे.

हाथ कब हथियार मेँ

तब्दील होँगे कौन जाने !

 तयशुदा घर लौटना होता नहीँ ;

अब नहीँ चलता कोई

विश्वास की अँगुली पकड़

, बोझ करुणा का कोई ढोता नहीँ ;

साख सारी खो चुके आदर्श टुटपुँजहे .

 ख़ौफ़ के बेशक्ल पत्थर

सनसनाते हैँ सरोँ पर,

साज़िशेँ बुनते सड़क के सुन्न सन्नाटे ;

 हादसोँ के साँप छुट्टे फन निकाले है बिचरते ,

 सो रहे प्रहरी ढँकेमुँह मार खर्राटे ;

अस्थि सूखी ले लड़े हैँ श्वान मरभुखहे.

 

 

देवेन्द्र पाठक 'महरूम'

 

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