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अफवाहें बिन पैर चलती हैं

 

 

अफवाहें बिन पैर चलती हैं-
बिन पर उड़ाती हैं।
चलते-चलाते, उड़ते-उड़ाते-
पल भर में कहीं से कहीं पहुँच जाती है।
इनका नहीं होता कोई रूप-
नहीं होता कोई रंग।
नहीं होती कोई चाल-
नहीं होता कोई ढंग।
वे इस कान से उस कान-
आती है जाती हैं................. अफवाहें.............. ।
लोग फूस फुसाते हैं,
नहीं खुल कर बतियाते हैं।
आँखों से करके इशारे-
अफवाहें उड़ाते हैं।
ये तैरती हवा में इस पार से-
उस पार जातीं हैं................. अफवाहें.............. ।
ये होतीं हैं सच से दूर-
और झूट का पुलिन्दा।
इनको हवा देता है-
मौका परस्त बन्दा।
फिरकापरस्ती दिलों में-
नफरत जगाती है................. अफवाहें.............. ।
अफवाहों की आग पर-
लोग सेकते हैं रोटियाँ।
बिछा लेते हैं राजनीति की बिसात-
बिठाते हैं गोटियाँ।
दिलों में शक नफरत जगाते-
नहीं इनको शर्म आती है................. अफवाहें.............. ।

 

 


जयन्ती प्रसाद शर्मा

 

 

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