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अगणित यादें,चिरकाल उदासी

 

 

Dinesh Jangra

 

 

फूल खिले पर दिल मुरझाया,
ठंडी हवा ने फिर आ
ज जलाया।

 

पत्तों से ज्यादा जख्म हरे हैं,
जीवन खाली,दुःख भरे हैं।

 

पुष्प सुगंध व्यर्थ ही बहती,
तरु छाया भी शुकून ना देती।

 

कुंकती कोयल अब मन ना लुभाती,
सतरंगी तितली मूझे चिढ़ाती।

 

बबुल में शूल,पर चुभन है मन में,
कुरूप जिंदगी सुन्दरवन में।

 

वन में वृक्ष गिरते,नए उगते,
पर परम मित्र के विकल्प ना मिलते।

 

वहाँ गया फिर तु मिला ना साथी,
छोड़ अगणित यादें,चिरकाल उदासी।

 

 

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