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अगहन का वह गुरुवार था

 

 

aghan wah

 

 

"अगहन का वह गुरुवार था,
मेरे गाँव का हाट-दिवस,
मुझे क्या पता था, मैं उस
दिन होने वाली हूँ परवश,

 

 

मैं सखियों के साथ, सुबह से,
मेले जाने को निकली,
बता! ढाँपती कैसे यौवन,
उत्श्रृंखल, भोली-पगली,

 

 

उछल-कूद-ठट्ठा करते जब,
हम सब पहुँचे मेले में,
चलना कठिन वहाँ था, सुन
लो! मेले के उस रेले में,

 

 

कहीं लगे थे झूले, बच्चे
आनंदित और व्यग्र किशोर,
वहीं कहीं उस विकट भीड़ में,
आया था मेरा चितचोर,

 

 

हम अपनी बारी में, झूले
पर बैठे, उल्लास लिए,
एक खेप नवयौवन का था,
फेरों में मधुमास लिए,

 

 

सहज वहाँ दृष्टव्य सभी को,
अनगढ़ यौवन के प्याले,
कुछ किशोर, कुछ नव किशोरियाँ
बाहों में बाहें डाले,

 

 

नव किशोर और नव किशोरियाँ,
कुछ वरिष्ठ, कुछ बच्चे थे,
जीवन धन सौरभ लेते सब के
सब, मन के अच्छे थे,

 

 

डंडा नृत्य वहाँ करते कुछ
यदुवंशी भोले-भाले,
अरे! लगे ज्यों व्यथित हृदय-मन,
परमानंद यहीं पा ले,

 

 

एक विचित्र रति ध्वनि मादक वह,
पहली आहट, पहला प्यार,
बजने लगा हृदय धक-धक और
होने लगी मधुर झंकार,

 

 

उनकी दृष्टि पड़ी क्या मुझ पर,
मदिरा घुसी शरीर मेरे,
हा! कठोर वे ढाल कान्त के,
आहत लगते तीर मेरे,

 

 

मेरी छाती से हृद्खग वह,
निकल उड़ा किस ओर?
कैसा जादू काम का चला,
उड़ी पतंग बिन डोर,

 

 

मैं नारी हूँ, नर से मैं, अतिरिक्त
प्यार के मांगूँ क्या?,
साड़ी, कंगन और सिन्दूर मैं,
धन श्रृंगार के मांगूँ , ला!!"

 

 

 

संजय कुमार शर्मा

 

 

 

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