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ए मुशाफिर

 

 

ए मुशाफिर मानवता की राह केकांटेतूनिकाल दे
आगे बढ़ने से पहले हल कर ये सवाल दे ....

 

जो एक हुआ करते थे उन्हें किसने भिड़ाया
मजहब के नाम पर हे उन्हें किसने लड़ाया.....

 

क्या उस समय कोई और यहाँ सिपहसलार था
नही हम ही थे जिसने यहाँ कत्लेआम किया था ...

 

किसने यहाँ कोंमों को बदनाम किया था
वो हम ही थे जिसने यह काम किया था....

 

किस दोस्त ने दोस्त से दगा किया था
वो हम ही थे जिसने दोस्ती का क़त्ल किया था....

 

शांति और अमन को हमने भुला दिया
मजहब के नाम पर सब कुछ लुटा दिया......

 

क्या प्यार और दोस्ती मिट गयी जहाँ से
तू इसके गुल एक बार फिर खिलाता जा....

 

जनत है ये धरती इसे जनत तू बना दे
मानव तो मानव है, बस मानवता का पाठ पढ़ा दे..

 

जीना है खुशहाली से तो ये जिंदगी कम है
फिर क्यूँ हाथ में हमारे बन्दुक और बूम है....

 

ए मुशाफिर तू बिछड़े यार से उसका यार मिला दे
कितने बिछड़े यहाँ उनसे उनका परिवार मिला दे...

 

क्या फिर एक बार ये कहेगी मेरे कलम की स्याही
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई सारे हैं भाई......

 

सच है या बस मेरा ख्याल हे ये
ए मुशाफिर मानवता की राह के कांटे तू निकाल दे......

 

 

 

..... © संदीप सिंह रावत (पागल)

 

 

 

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