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अकविता

 

 

दूर से देखा तो एक मासूम चेहरा,
वस्त्र इतने जितने पतझड़ में पत्ते हो।
छोटी उम्र रही होगी बारह बरस की।
सामने दो काले भुजंग पहलवान।
बोलियाँ ऐसे मनो आलू बिक रहे हो।
माँ बाप हाँथ जोड़े मनो कर्ज खाए हो।
नादान का सर झुका हुआ,काले तूफान की खबर नही,
सखियों से कहती की अभी आती,
उसे अंदेशा भी नही की अब लौटना संभव नही।
माँ-बाप की क्या मज़बूरी रही होगी?
क्या खाने को नही ,पहनाने को नही या बेटी बोझ??
नाजुक कली भवरे के पैरों से भी टूटने वाली
क्या दो काले भुजंगो को एक साथ.............
सोंच कर ही डर लगता।
लडकियाँ क्या सिर्फ मनोरंजन का साधन???

 

मैं????मैं क्यों किसी के लिए कुछ करूँ??
मेरी बेटी या बेटा थोड़े ही
मैं तो समाज हूँ सिर्फ देखना और हँसना जनता।
चार बाते बताने में मज़ा ही और।
पर वो छोटी का दोष इतना की वो लडकी??
या गरीब पैदा हुई?
या मेरी बेटी नही?
वो भी समाज का हिस्सा है।
चलो मैं आगे बढूँ,हाँ मैं आगे बढ़ता हूँ,
पर ये क्या दरोगा जी भी???
ये तो पूरा काजल का पर्वत है।
अच्छा आज मंत्री जी इलेक्शन जीते है।
तो क्या ये उनकी जीत का इनाम है उनके आदमियों के लिए??
मंत्री जी तो अच्छे आदमी है???

 

मैं ऐसे समाज में रहता हूँ,धिक्कार है ।
कविता लिखी प्रेयसी उदासी की....
यहाँ बेटियाँ नोची जाती और मरोड़ के फेक दी जाती?
कब तक चलेगा,,कब तक???

 

 

 

-----प्रणव मिश्र----

 

 

 

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