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एकत्व

 

 

टूटी टूटी चट्टानों से
हुई धरा जो निर्मित
मुझमे भी वही जड़ तत्व
मैं हूँ उसी से पूरित

 

चाहें अनन्त आकाश हो
कल-कल बहता जल
उसी भाँति आसुत होकर
मैं भी बना हूँ निर्मल

 

मैं ही स्वछन्द मुक्त पवन
जन जीवन का आधार
शिव जटा के चन्द्रमा का
हूँ अकेला मूल प्रसार

 

सारे तत्वों से निर्मित ;बना
हुआ है एक शरीर
मुझमे अमर तत्व इक और भी
फिर कैसे हूँ मैं फ़कीर?

 

सब कुछ तुममे मुझमे एक
कैसे दो की बात मैं लाऊँ?
अगर मैं तुमको मरता हूँ
मैं खुद को ही चोट पहुँचाऊँ

 

अरे संन्यासी साधो शांति
तुम को मैं कुछ दिखलाऊं
सदियों से सोये जाग्रत होकर
ध्यान में तत्व दर्श करवाऊँ

 

 

©प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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