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अनुराग

 

 

अंगद की तरह जड़त्व थे जो पग,
वो पग क्यों अब डगमग हो रहे,
आँधियों में शिखरों की भाँति स्थिर मन,
आज यादों के झोकों से क्यों विचलित हो रहे....

 

उनकी एक झलक पाने की चाहत,
उन क्षणो को थामने की लालसा बन रही,
क्यों ज्येष्ठ से निजात पाने की आषाढ़ की ख़्वाहिश,
फिर सावन की मस्ती को तरस रही....

 

और नीर भले नहीं इन आंखियों में,
पर पीर बड़ी है इस ह्रदय में......

 

 

धनेन्द्र कुमार

 

 

 

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