tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






अरमान

 

आसमान के आरपार
मेरा अरमान
यों पंख पसारें !
पंख पंखों से
सटकर सोने की
मेरी ललक !
मिलन की बंदिशें;
मृषा का अफसोस भी
मुझे भाता नहीं !
क्या तुम......
मेरे सिराओं के
खून से घुलकर
सतरंग रचती
इन्द्रधनुष बनोगी ?

 

 

डा० टी० पी० शाजू

 

HTML Comment Box is loading comments...