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आज बसंत की छाई लाली

 

 

आज बसंत की छायी लाली,
बागों में छायी खुशियाली,
आज बसंत की छायी लाली॥

 

वृक्ष वृक्ष में आज एक नूतन है आभा आयी।
बीत गयी पतझड़ की उनकी वह दुखभरी रुलायी।
आज खुशी में झूम झूम मुसकाती डाली डाली।
आज बसंत की छायी लाली॥1॥

 

प्रदान किये हैं इस बसंतने उनको नूतन पल्लव।
चहल पहल में बदल गया अब उनका जीवन नीरव।
गूँज रही है अब वहाँ पर मधुकर की गूँजाली।
आज बसंत की छायी लाली॥2॥

 

स्वर्णिम आभा छिटक रही आज रम्य अमराई में।
महक उठी बौरों से डालें जैसे बाला तरुणाई में।
फिर कानों में मिश्री घोल रही कोयल मतवाली।
आज बसंत की छायी लाली॥3॥

 

आज चाव में फूल रहे पौधे वृक्ष लता हर।
बाग बगीचे सजा रहे मृदु आभा को बिखरा कर।
कैसी छायी दिग दिगंत में ये मोहक हरियाली।
आज बसंत की छायी लाली॥4॥

 

मंद समीर के हल्के झोंके तन को करते सिहरित।
फूलों की मादक सौरभ मन को करती मोहित।
श्रवणों में संगीत के स्वर दे पुर्वा पाली पाली।
आज बसंत की छायी लाली॥5॥

बिखरा सुंदर नीलापन विस्तृत इस गगन में।
संध्या की लाली छायी फिर इस नील वरन में।
उस पर पक्षी चहक रहे भर मन में खुशियाली।
आज बसंत की छायी लाली॥6॥

 

जग की हर वस्तु में आज नव उमंग है छायी।
इस बसंत की खुशियां जा हर मन में आज समायी।
जिसकी रचना इतनी सुंदर कितना सुंदर वह माली।
आज बसंत की छायी लाली॥7॥

 

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

 

 

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