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मन की बेसुधी को

 

 

kalam

 

 

मन की बेसुधी को
लावारिस छोड़ के ।
चेतना के घाट पे
आया सब छोड़ के ।
रथ का रथी मैं हूँ
रथ भी सारथी मैं ही हूँ
जलता गर दीपक हूँ
आरती भी मैं ही हूँ !!
तुमसे कहता हूँ मीत
सर्जनाएं छोडो मत ।
प्रकृति की अनुरेखित
वर्जनाएं तोड़ो मत !!
युगों बाद आया था
विदा करो जाता हूँ ।
किसी युग में फिर से
लौट कर मैं आता हूँ
इस युग के बच्चों को
कह दिया है काम करो
युग दर्शक भारत हो
तब ही आराम करो ।
सफलता के सुन्दर पथ
श्रम बिन क्या पाओगे ।
साधक बन सफलताएं
सहज ही पा जाओगे ।।
जब अभाव में घिरो
तब लेना मेरा नाम ।
जानते ही कौन हूँ मैं-
बच्चों मैं अब्दुल कलाम ।।_____

 

 


👏👏👏गिरीश बिल्लोरे मुकुल

 

 

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