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बेटी बचाओ बेटी पढाओ

 

 

नाज करो तुम ना शर्माओ,
बेटी बचाओ बेटी पढाओ।
बेटी आँगन का अनमोल मोती होती है,
आशाओं के दीपक की ज्योति होती है।
नयी सोच से दो घर का कल्याण करों,
पढा-लिखा के बेटी का उत्थान करो।
इसी मुहीम में तुम भी आगे आओ,
बेटी बचाओ बेटी पढाओ।

 

 

कमजोर-अबला अब शब्द पुराने होने दो,
फूलों को ए माली! अब फौलादी होने दो।
बेटी घर की रोशनी, बेटा घर का उजियारा है,
बेटी हमको प्यारी, बेटा भी हमको प्यारा है.
बेटा-बेटी का भेद मिटाते जाओ,
बेटी बचाओ बेटी पढाओ।

 

 

बेटी बेटों से कदमों से कदम मिलाती है,
शरहद से घर तक ये हरेक फर्ज निभाती है।
बेटों ने बुढापे में जब भी बुरा हाल किया,
बेटी ने आकर माँ-बाप का ख्याल किया।
बुढापे की लकड़ी को और मजबूत बनाओ,
बेटी बचाओ बेटी पढाओ।

 

 

क्यों बेटी को गर्भ में मारा जाता है?
बेटी को बेटों से कम क्यूँ दुलारा जाता है?
क्यूँ हम बेटी की शिक्षा का ध्यान नहीं देते?
क्यूँ हम बेटी को उचित सम्मान नहीं देते?
बेटी की गरिमा को और बढाओ,
बेटी बचाओ बेटी पढाओ।

 

 

 

दिनेश जांगड़ा  

 

 

 

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