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भारत गौरव

 

 

जय भारत जय पावनी गंगे
जय गिरिराज हिमालय ;
आज विश्व के श्रवणों में
गूँजे तेरी पावन लय ।
नमो नमो हे जगद्गुरु
तेरी इस पुण्य धरा को ;
गूंजित करना ही सुझे
तेरा यश इन अधरों को ।।1।।

 

उत्तर में नगराज हिमालय
तेरा शीश सजाए;
दक्षिण में पावन रत्नाकर
तेरे चरण धुलाए ।
खेतों की हरियाली तुझको
हरित वस्त्र पहनाए ;
सरिता और शैल ता में
मनभावन सुमन सजाए ।।2।।

 

गंगा यमुना और कावेरी
की शोभा है निराली;
अपनी पावन जलधारा से
खेतों में डाले हरियाली ।
तेरी प्यारी भूमि की
शोभा है बड़ी निराली;
कहीं पहाड़ है कहीं नदी है
कहीं बालू सोनाली ।।3।।

 

तूने अपनी ज्ञान रश्मि से
जग में आलोक फैलाया;
अपनी धर्म भेरी के स्वर से
तूने जग को गूँजाया ।
तेरे ऋषि मुनियों ने
जग को उपदेश दिया था;
योग साधना से अपनी
जग का कल्याण किया था ।।4।।

 

अनगिनत महाजन जन्मे
तेरी पावन वसुधा पर;
हरिश्चन्द्र शिवि ओ' करण सम
दानी आए इस पर ।
दानशीलता से अपनी
इनने तुमको चमकाया;
तेरे मस्तक को उनने
अपनी कृतियों से सजाया ।।5।।

 

तेरी पुण्य धरा पर
जन्मे राम कृष्ण अवतारी;
पा कर के उन रत्नों को
थी धन्य हुई महतारी ।
अनगिनत दैत्य रीपु मारे
धर्म हेतु जिनने;
ऋषि मुनियों के कष्टों को
दूर किया था उनने ।।6।।

 

अशोक बुद्ध से जन्मे
जन जीवन के परम सहायक;
मानव हृदय के सहचर
धर्म भेरी के निनादक ।
राणा शिवा से आए
हिंदुत्व के वे पालक;
मर मिटे जन्म भूमि पे
वे देश के सहायक ।।7।।

 

थे स्वतन्त्रता के चेरे
भगत सुभाष ओ' गांधी;
अस्थिर न कर सकी थी
उनको विदेशी आँधी ।
साहस के थे पुतले
अरु धैर्य के थे सहचर;
सितारे बन के चमके
वे स्वतन्त्रता के नभ पर ।।8।।

 

मातृ भूमि की रक्षा का
है पावन कर्त्तव्य हमारा;
निर्धन दीन निसहाय
जनों के बनें सहारा ।
नंगों को दें वस्त्र
और दुखियों के तारनहारा;
भूखों को दें भोजन
बन उनके पालनहारा ।।9।।

 

ऊँच नीच की मन से हम
पूरी तजें भावना;
रंग एक में रंग जाने की
हम सब करें कामना ।
स्वतन्त्र भारत के युवकों का
हो यह पावन कर्म;
देश हमारा उच्च रहे
अरु उच्च रहे हमारा धर्म ।।10।।

 

 

 

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

 

 

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