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"तब भारत जागेगा भाई।"

 

bharat

 

"क्या होगा जब भारत के सब सोए हिन्दू जागेंगे,
सुन कर सिंह की गर्जन, वन से कायर गीदड़ भागेंगे,
जब महत्व समझेंगे जन गंगा-जमुना के पानी का,
आैर रखेंगे याद समर्पण भगत सिंह बलिदानी का,
जब बिस्मिल का ख़ून करें महसूस, ख़ून में सब अपने,
तब शायद पूरे होंगे, इस मातृभूमि के सब सपने,
जब याद करें सुखदेव और आजादों की क़ुर्बानी को,
जब स्मृत हम सभी करेंगे, झांसी वाली रानी को,
तब भारत जागेगा भाई, तब भारत जागेगा भाई।

 

 

जब एक रंग में रंगे दिखेंगे, हँसते सब भारतवासी,
जब सब कबीरपंथी होंगे, क्या काबा, क्या मग़हर-काशी,
जब उच्च हिमालय की चोटी पर भगवा ध्वज फहराएगा,
तब किसकी हिम्मत, देशप्रेमियों पर ख़ंज़र लहराएगा,
जब भ्रष्टाचार हटे, जन से धन की लिप्सा टल जाएगी,
तब अंधकार छँट जाएगा, मन की बाती जल जाएगी,
जब लोकतंत्र का सही अर्थ समझे, क्या बूढ़ा, क्या बच्चा,
हो राजनीति में नवाचार, आए कोई नेता सच्चा,
तब भारत जागेगा भाई, तब भारत जागेगा भाई।

 

 

जब ऐसे जन-प्रतिनिधि होंगे, जो जनता की पीड़ा समझें,
जो नहीं मात्र मतदाता को, हर पाँच वर्ष कीड़ा समझें,
जब दलित शब्द की परिभाषा, जाति से उठ कर की जाए,
जब आरक्षण का प्रबल गरल, कोई शिव आए, पी जाए,
जब विधान परिषद-संसद में मातृभूमि की बातें हों,
और परिणामस्वरूप देश,हित संबंधी सौगातें हों,
जब नेता-मंत्री-अफ़सर, ख़स्ताहाल सड़क पर घूमेंगे,
और मातृभूमि की धूल फाँक, धरती का माथा चूमेंगे,
तब भारत जागेगा भाई, तब भारत जागेगा भाई।

 

 

जब मंदिर-मस्ज़िद साथ बनेंगे, गिरिजा और गुरूद्वारे में,
जब दीवाली और ईद मनें, मिल-बैठ कहीं चौबारे में,
तब जा कर सूर्योदय होगा, भारत की काली रातों में,
जब सहिष्णुता का मधुरस टपके धर्मों की बातों में,
जब मुसलमान मानें क़ुरान की और हदीस की राह चलें,
ख्रीस्ती-सिक्ख, हिन्दू-मुसलमान, बांहों में डाले बांह चलें,
कहीं न हों दंगे मज़हब पर, मनखे-मनखे एक समान,
सभी जान जाएँ धरती माता है सबकी, सबके प्राण,
तब भारत जागेगा भाई, तब भारत जागेगा भाई।

 

 

जब शिक्षा का व्यापार बंद हो, सरकारी विद्यालय हों,
मदिरालय हों बंद, जगह उनके, कोई ग्रंथालय हों,
पढ़ें-पढ़ाएँ, सुनें-सुनाएँ, रामचरित मानस-गीता,
हों नर, मर्यादा पुरुषोत्तम, नारी में हों राधा-सीता,
थोथे विकास की भेंट चढ़ रहे वन को कटने से रोको,
देखो जल का जो दुरुपयोग, समझाओ, मूर्खों को टोंको,
जब न्याय व्यवस्था हो स्वतंत्र, धनवालों की मनमानी से,
तब मधुरस की धार मिलेगी, उस चंबल के पानी से,
तब भारत जागेगा भाई, तब भारत जागेगा भाई।।"

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

 

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