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भटका हूँ न जाने किस सफर का मुसाफिर हूँ

 

 

भटका हूँ न जाने किस सफर का मुसाफिर हूँ .

अजनबी हूँ दो रोटी कमाने सहर आगया हूँ .

काम की तलाश में सहर भर की खाक

छानता हूँ .

जो काम मिले बिना लाग्-लपेट करता हूँ .

लोगो की दो -चार धौस भी सहता हूँ .

रोटी -दो रोटी खाकर

कभी-इधर तो कभी उधर कैसे भी

मुफ़लसी में ही गुजरा करलेता

हूँ .

धन नाते और कुछ नहीं एक पोटरी

जो हर दम साथ लेकर चलता हूँ .

चोर -उचक्कों के दर से

अपनी पोटरी

सिने से लगा के रखता हूँ .

पोटरी में ज्यादा कुछ नहीं

दो जोड़ी लत्ते एक ढेला

गुड़ रखता हूँ .

माँ कहती थी...

या जीवन मा तन ही है आपन सहाय

रोटी चाहे न मिले रोज बिहन्ने

गुड़ाई के साथे पानी पीजिये .

घर भितरे आप मर्जी

बहिरे बन -ठन के ही निकलिये.

कलयुगी इस दुनिया में

आपन -पराया कोनो भेद नाही

सबहि सम समझिये.

रोबहि भितरे

अपन पीड़ा बहिरे केहू से न कहिये .

जेहि विधि राखे राम

ताहि विधि रहिये .

विधि -विधान जान लाभ-हानि सबहि

प्रभुकृपा समझिये .

तिनका सा ये जीवन कबहु न कोऊ से बैर कीजिये .

जेहि बिधि मिले जो सबहि से राम -राम कहिये .

समझ-समझ का फेर है .

ईस्वर भी न हो साथ तभी साथ माँ होती है .

जग बैरी हो जाए माँ कभी बैरी नहीं होती है .

माँ ही है जो अपने लिए नहीं मेरे लिए जीती है .

मुझे तो माँ में ही ईस्वर नजर आता है .

माँ की महिमा अब और न कही जाती है.

आज कोई नहीं है साथ ,

अहजान से भरा ये सफर

कही दूर खुद में भी मयासर नहीं

सिर्फ माँ याद आती है .

माँ की कही इन बातो को याद

कर मन भर आता है .

भला कौन है इस जग में

जो ऐसी बात सिखाता है .

 

 

 

Dharmendra Mishra

 

 

 

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