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भूल जाते हैं

 

 

जो जरुरी नहीं वो अक्षर भूल जाते हैं,
लोग चेहरे और नाम अक्सर भूल जाते हैं।

 

परिंदों का सफ़र है दाना-पानी की खोज में,
नए तिनके पाकर पुराने शज़र भूल जाते हैं।

 

वफ़ा और वक्त से भी जो तेज़ चलते हैं,
नींद खुलते ही वो बिस्तर भूल जाते हैं।

 

लाश तो मिली पर कौन था कातिल?
अदालतों में गवाह भी मंजर भूल जाते हैं।

 

शहर जाकर महलों को जो ख़ुदा मान बैठे,
गांँव के मंदिर के वो पत्थर भूल जाते हैं।

 

ए दोस्ती के अंगोछे तुझे कौन याद रखेगा?
गर्मियां आते ही लोग मफलर भूल जाते हैं।

 

 


© दिनेश कुमार 'डीजे'

 


शज़र-पेड़

 

 

 

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