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बहुत सही मैंने बिरहा की रातें

 

virhake

 

 


"बहुत सही मैंने बिरहा की रातें,
अब तारे गिन-गिन,
पाने की उत्कट अभिलाषा,
पोर-पोर में अब छिन-छिन,

 

आओ! प्रियतम, लगो मेरे सीने
से, कर दो मत्त मुझे,
युवा अवस्था, अंग फड़कते,
रखे हुए अभिशप्त मुझे,

 

बहने दो रस की धार, मेरे
बंजर में हरियाली कर दो,
हे आर्य! शस्त्र-शस्त्रास्त्र रखे
जितने, मुझ पर खाली कर दो,

 

भरो रिक्तियाँ मेरी सभी, मन
सराबोर रस से कर दो,
कर दो पूर्ण मुझे, हे शिव! मैं
शाक्त, शक्ति तन में भर दो,

 

काम! तेरे बिन ग्रीष्म लग रहा
यह सावन, अब आ जाओ!,
रति विधवा सी लगे ईला, बन
मेघ, धरा पर छा जाओ,

 

बरसो जी भर, निर्जल पृथ्वी को
हरित पर्ण जीवन दे दो,
हे दानी। तुम दानवीर सम कर्ण,
दान रति धन दे दो,

 

हे कान्ता! तेरी रूपराशि का
आकर्षण मुझ पर भारी,
काम छटपटा रहा मेरा,रति
तेरी माया अतिचारी,

 

राम-जानकी, राधा-मोहन,
शिव-शक्ति और नर-नारी,
सभी काम-रति कृपा पात्र थे,
जाने यह पृथ्वी सारी,

 

किन्तु भेद यह हमें समझना है
कि, 'काम सहकार',
जैसे-जैसे विरह बढ़े, बढ़ता
जाता है प्यार,

 

है गृहस्थ सन्यास का चरम,
महायोग संभोग,
जीव जन्म उद्देश्य प्रकृति का,
नहीं मात्र संयोग,

 

जन्म काम से, मृत्यु कामवश,
कामयोग, जीवन सारा,
प्रेम, दया, ममता, सहिष्णुता,
नहीं भोग, जीवन सारा,

 

क्या जीव जन्म के सही अर्थ,
प्रियतमा! तुम्हें समझाऊँ मैं,
प्रेम, प्रेम और प्रेम मात्र है
मोक्ष, तुम्हें बतलाऊँ मैं।।"

 

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

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