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बूढ़ी आँखों के सपने

 

शायद गिन के बैठे हूँ मैं
अब बची हुई साँसे मेरी
कवि जी मरने से पहले
रे करोगे क्या इक्षा पूरी?

 

देखना चाहता हूँ घूर वो
और उस पर उगता पुपनू
कहीं शाम ढलते ही जो
कुलबुलाता छिपता जुगनू

 

ढलता हुआ लाल दिवाकर
जो बैठा छिप खेतों में मेरे
उस मदारी के डमरू को भी
जिसको बैठे बच्चे घेरे

 

कंचे और अट्टी की गुचियों को
जो दब गई कवि जी फर्शों से
जाओ और ढूंढ के लाओ तुम उसे
ढूँढ रहा जिसे मैं नीरवता से

 

खेलना चाहता हूँ लुल्ला चोर
और किसी से टीप खाना भी
दौड़ना चाहता हूँ धूल उडाता
और जाती छांह पकड़ना भी

 

इतना ही नही चूसना है गन्ना
अम्बियां चुरा बाग से भागना
इस पर खानी अम्मा की डाट
फिर मेरा फूट-फूट खूब रोना

 

रे वो राब का शर्बत कवि जी
जो शक्कर से भी मीठा है
रे वो अमरुद खाना कवि जी
सब बोले तोते का जूठा है

 

इन सबका स्वाद चखाओ रे
सब मिलाकर गीत बनाओ रे
फिर उसको मुझको पिलाकर
यहाँ से अब विदाई दिलाओ रे

 

 

© प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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