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आज कुछ चौपाइयां

 

मन में था जो दर्द निराला
गीतों में है उसको ढाला
मन खेतों में प्रीत उगाई
नित आँसू से करी सिँचाईं
2
लूली लँगड़ी सी आजादी
कर गई नस्लों की बर्बादी
रग-रग में है नमक हरामी
नाच रही सर बैठ गुलामी
3
पलकों से जब चाँद उठाया
किरणों किरणों तुझको पाया
हर शै में थी सुधियाँ तेरी
या थी पगली आँखें मेरी
4
क्यारी-क्यारी महकी-महकी
शाख-शाख पर चिड़िया चहकी
झूमें फसलें लहकी-लहकी
रुत फागण की बहकी-बहकी
5
सूरज निकला चीर अँधेरा
टूट गया है दुःख का घेरा
मुसकानों में ढली उदासी
लौटा घर को सुख वनवासी
6
मरने को तो हम मर जायें।
आह जरा न लब पर लायें।।
संग तुम्हारे बात निराली
लगती मुझको रोज दिवाली
7
ओढ़ा जबसे श्याम दुशाला
हुआ मन, करम रूप निराला
मद, माया की चादर त्यागी
पीड़ा सारी मन की भागी

 

 

 

साहित्य कार
आशा पाण्डेय ओझा

 

 

 

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