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दर्द का एहसास

देवी नागरानी

 

 

 


दामिनी के
दर्द का अहसास होगा
मर्द को, कभी तो होगा
यक़ीनन आज नहीं तो कल ,
आने वाले कल में ही सही, या
होगा तब जब
उसकी अपनी माँ-बहन
बेटी-बहू, या बीवी खुद
रेंगती हुई छटपटाएगी
उन शिकंजों के चंगुल में,
जो पाठ मानवता का
कभी पढ़ न पाये, जिनके
दूध में और ख़ून में
शायद कभी इंसानियत घुल ही न पाई!
क्या समझ पाएंगे वे पीड़ा
नारी के अपमान की
निर्वस्त्र जब उसकी परतें हुईं
जिस्म ने तब बेलिबासी ओढ़ ली।
कोई पांडव, कृष्ण कोई
अंग-वस्त्र न ला सका!
सुन न पाया कोई
उस उबलते लहू की पुकार
जो किसी दुखियारी माँ की
बददुआ की चीख थी
आग के बदले जो आहों को उगलती रह गई।
और उगलती ही रहेगी
उस समय तक
जब तलक
उस आह के दरिया के पिघलते लावा में
धंस न जाएगी दरिंदगी,
दर्द की उस बाढ़ में
तब तक नहाएगी गंदगी!
तब ज़रूर एहसास होगा
हर दामिनी के इस दर्द का
जो ज़िंदगी में जीते जी
दाह पर आह भरती रहती है!!

 

 

 

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