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दस्तक

 

 

मेरे घर के
बन्द द्वार पर
प्रायः दस्तक होती है।
मुझे लगता है कि
कोई मेहमान आया है!!
दस्तक-दर-दस्तक पर
मैं
दिवास्वप्न देखता हूं कि
आए हुए मेहमान ने
मेरे पूरे परिवार के लिए
उपहारों का टोकरा
घर के बरामदे में उतरवाकर
रखा हुआ है।
वह मेहमान
मेरी पत्नी को शिफान की साड़ी
बच्चों को खिलौने एवं कपड़े देगा
मुझे जैकेट एवं कुता-धोती
मैं हर दस्तक पर खुश होता हूं।
सपने देखता हूं।
अपने घर के द्वार पर खड़े
उस मेहमान के स्वागत के लिए
तोरणद्वार बनाता हूं।
मैं हर दस्तक पर भूल जाता हूं
अपनी मुफलिसी, शोक संताप
और त्रासदी भरा जीवन!!
लेकिन हर बार की दस्तक पर
मेरे सपने मात्र सपने बनकर ही रह जाते हैं।
और
मेरे द्वार पर
दस्तक देने वाला मेहमान
मुझे अपेक्षित वस्तुएं
उपहार में नहीं देता है।
देता है तो सिर्फ
वह सभी वस्तुएं
जो मुझे विरासत में मिली हैं
मसलन-
गरीबी, संत्रास आदि............
और दस्तक
बदस्तूर जारी रहती है!!!

 

 


-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

 

 

 

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