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देश तब आज़ाद होगा॰॰॰—–संजय कुमार शर्मा


ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रों का ख़तम जब भेद होगा,
बाईबिल एक हाथ ,दूजे में क़ुरान-ऒ-वेद होगा,
मंदिरों के पट खुलेंगे ,जब यहां रमज़ान में,
और प्रार्थना के स्वर उठेंगे सुबह हर अजान में,
पूजा करेंगे मूर्तियों की ,मुल्क़ में सब प्यार से,
और इबादत ख़ुदा की ,हिन्दू करें मनुहार से,
जब इबादतगाहों में घंटी का स्वर आबाद होगा,
देश तब आज़ाद होगा।
क्या बौद्ध से,क्या सिक्ख से,क्या पारसी,क्या जैन से,
कह रहा संजय ! रहो सद् भाव ,अमनो-चैन से,
शिव मेरा ,अल्लाह तेरा ,ईसा किसका ,बुद्ध किसका,
सब के सब हैं ,महावीरों सम मनस है शुद्ध जिसका,
जब दिलों में नानक-क़बीरा ,सन्त सम रैदास होंगे,
माँ वतन और जाँ वतन ,शिद्दत से ये एहसास होंगे,
वर्ण-भेदों से पृथक जब हृदय में आह्लाद होगा,
देश तब आज़ाद होगा।
राष्ट्र की रक्षा को तत्पर सब रहेंगे उम्र भर,
तब नहीं पीना पड़ेगा ,सुन ! ग़ुलामी का ज़हर,
जब मुसलमाँ लिक्खें भजन और ग़ज़ल हिन्दू जन लिखेंगे,
वेशभूषा-आन से सब लोग जब इन्साँ दिखेंगे ,
सब रहेंगे सद् भाव से संजय की है यह कामना,
और सीखेंगे सभी ,गिरते मनुज को थामना,
हर हृदय में जब अमन के वास्ते ज़ेहाद होगा,
देश तब आज़ाद होगा।
भ्रष्ट शासन की उठेंगीं देश में जब अर्थियाँ,
और पढ़ी जाएँगी गन्दे जन की जग में फ़ातिया,
आदमी जब आदमी होगा ,न हिन्दू-मुसलमाँ,
सबकी होगी सब्ज़ धरती ,सबका होगा आसमाँ,
जब जनाज़ा नफरतों का हम निकालेंगे यहाँ,
लाएँगे बारात ,ख़ुशियों से भरा एक क़ारवाँ,
वतन को शीरी समझ,दिल सरफिरा फ़रहाद होगा,,
देश तब आज़ाद होगा।
सब का मालिक़ एक है जो सबसे करता प्यार है,
क़ायम रखो रिश़्ता ज़मीं से ,यह जगत परिवार है,
एक है माटी सभी की ,गगन-पृथ्वी एक है,
एक हैं सूरज-सितारे ,हवा ,पानी एक है,
ख़ून सबका सुर्ख़ ,रचना देह की सम सभी की,
कल गया और कल नहीं ,करें आरती सब अभी की,
माता-पिता को मान देता ,यहाँ जब औलाद होगा,
देश तब आज़ाद होगा।

 

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