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धरती का रस फूल ने, सहज किया स्वीकार
नित नित ऐसे हो रहा, निराकार साकार

माया जादू कर रही, बदल बदल कर रूप
जितनी रखती छांव में , उतनी देती धूप

कोई भी लाता नहीं, प्रीतम का सबदेश
ब्याकुल मनवा बाबरा , भटके देश विदेश

छोटे बड़े महारती, जीवन है संग्राम
लड़ते लड़ते ही हम्हें , करना है विश्राम

मन त्रिशंकू लालची, माया मैं भरमाय
बीना राम को ध्याय के, कैसे स्वर्गहे जाय

हेमंत त्रिवेदी

 

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