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दोधक छंद

 

 

छंद सलिला:
दोधक छंद
संजीव
*

 


उदहारण:
१. काम न काज जिसे वह नेता / दोष दिखा जन-रोष प्रणेता
होश न हो पर जोश दिखाए / झूठ लगे सच यूँ भरमाये
दे खुद को खुद ही यश सारा / भोग रहा पद का सुख न्यारा

 

२. कौन? कहो मन_चैन-चुराते/ काम नहीं पर काम जगाते
मोह रहे कब से मन मेरा / रावण को भगिनी पग-फेरा
होकर बेसुध हाय लगती / निष्ठुर कौन? बनो मम साथी
स्त्री मुझ सी तुम सा वर पाये / मान कहा, नहिं जीवन जाए

 

३. बंदर बालक एक सरीखे---
बात न मान करें मनमानी
मान रहे खुद को खुद ज्ञानी
कौन कहे कब क्या कर देंगे?
कूद-गिरे उठ रो-हँस लेंगे
ऊधम खूब मरें संग चीखें---
खा कम फेंक रहे हैं ज्यादा
याद नहीं इनको निज वादा
'शांत रहें' कल खाकर कसमें
आज कहें बिसरी सब रस्में
राह नहीं इनको कुछ दीखे---
*****

 

 

 

संजीव ‘सलिल’

 

 

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